झारखंड: Health व्यवस्था का यह हाल देख कर दिल दहल गया। यह बिनीता बेटी एवं नवजात बच्चे की मौत नहीं, बल्कि संस्थागत हत्या है। मरांग बुरु दिवंगत आत्माओं को शांति प्रदान करें तथा उनके परिजनों को यह दुख सहने की शक्ति दें।

जिस राज्य का Health मंत्री इस व्यवस्था को सुधारने की जगह पत्रकारों को पिटवाने में ज्यादा रुचि रखता हो, जहाँ अस्पतालों की व्यवस्था ठीक करने की जगह नई बिल्डिंगें बनवाना सरकार की प्राथमिकता हो, जहाँ सरकार बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाने या आदिवासियों पर लाठी चार्ज करवाने को छोटी-मोटी बात मानती हो, वहाँ मोबाइल की रोशनी में हो रहे ऑपरेशन से अगर किसी गरीब परिवार के दो सदस्यों की जान भी चली जाये, तो राज्य सरकार को क्या फर्क पड़ता है? मेरे प्रयास से सरायकेला में एक नया अत्याधुनिक अस्पताल डेढ़ साल से बन कर तैयार है, लेकिन राज्य सरकार उसे शुरू ही नहीं करना चाहती। इसके पीछे सरकार की क्या मंशा है, वो तो वही जाने, लेकिन ऐसी लापरवाही से हो रही मौतें अगर नहीं रुकीं, तो फिर हम लोग जनता के साथ सड़कों पर उतरने को बाध्य होंगे।

झारखंड Health व्यवस्था का यह हाल संस्थागत हत्या या सरकारी लापरवाही?

आजकल झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की खबरें सुनकर दिल दहल जाता है। बिनीता बेटी और उसके नवजात बच्चे की मौत जैसी त्रासदी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि झारखंड Health व्यवस्था की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। मोबाइल की रोशनी में ऑपरेशन, HIV संक्रमित रक्त चढ़ाना, आदिवासियों पर लाठीचार्ज – ये सब क्या Health व्यवस्था का यह हाल नहीं दर्शाते? इस लेख में हम गहराई से चर्चा करेंगे कि आखिर झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी जर्जर क्यों हो गई है, सरकार की क्या मंशा है और इसका समाधान क्या हो सकता है। अगर आप भी इस लापरवाही से त्रस्त हैं, तो अंत तक पढ़िए।

झारखंड Health व्यवस्था का काला अध्याय बिनीता की मौत ने खोला राज

झारखंड में हाल ही में सरायकेला के एक अस्पताल में जो कुछ हुआ, वो किसी सनसनीखेज फिल्म से कम नहीं। बिनीता नाम की एक गरीब बेटी डिलीवरी के लिए अस्पताल पहुंची। लेकिन वहां बिजली गुल होने पर डॉक्टरों ने मोबाइल की रोशनी में ऑपरेशन कर दिया। नतीजा? मां और नवजात दोनों की मौत। ये Health व्यवस्था का यह हाल कहां ले जा रहा है?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में प्रति 1000 बच्चों पर शिशु मृत्यु दर 22 है, जो राष्ट्रीय औसत से दोगुनी है। ग्रामीण इलाकों में 70% से ज्यादा Health केंद्र बिना डॉक्टर के चल रहे हैं। बिनीता जैसी घटनाएं पहली नहीं हैं। 2023 में रांची के सदर अस्पताल में HIV संक्रमित रक्त चढ़ाने से कई बच्चों की जान पर बन आई। फिर आदिवासी इलाकों में लाठीचार्ज की घटनाएं – ये सब झारखंड Health व्यवस्था की पोल खोलती हैं।

क्या ये संयोग हैं या संस्थागत हत्या? विशेषज्ञों का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं की कमी – जैसे जनरेटर, स्टाफ की कमी और दवाओं का अभाव – मौतों का मुख्य कारण हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 50% अस्पतालों में बिजली बैकअप नहीं है। गरीब परिवारों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है, क्योंकि वो प्राइवेट अस्पतालों का खर्च नहीं उठा पाते।

Health मंत्री की प्राथमिकताएं सुधार की जगह पत्रकारों पर लाठी?

झारखंड का स्वास्थ्य मंत्री सुधार की बजाय पत्रकारों को पिटवाने में ज्यादा रुचि रखते हैं, ये बात अब सब जानते हैं। हाल के दिनों में कई पत्रकारों ने Health व्यवस्था का यह हाल उजागर करने की कोशिश की, तो उन पर लाठियां बरसाई गईं। सरकार की प्राथमिकता नई बिल्डिंगें बनाना है, जबकि मौजूदा अस्पतालों की हालत दयनीय है।

उदाहरण लीजिए – रांची में करोड़ों खर्च कर नई बिल्डिंग बनी, लेकिन स्टाफ और उपकरणों की कमी से वो खाली पड़ी हैं। सरायकेला में डेढ़ साल से एक अत्याधुनिक अस्पताल तैयार है, लेकिन सरकार उसे शुरू नहीं कर रही। क्यों? क्या इसमें कोई सियासी मंशा है? विपक्ष के प्रयासों से बना ये अस्पताल गरीबों के लिए वरदान हो सकता था, लेकिन सरकारी उदासीनता से वो बेकार पड़ा है।

झारखंड Health व्यवस्था में भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा है। टेंडर घोटाले, दवाओं की कालाबाजारी और नकली उपकरण – ये सब आम हैं। एक NGO की रिपोर्ट कहती है कि 40% स्वास्थ्य बजट गबन हो जाता है। ऐसे में मंत्री जी सड़क पर उतरने की धमकी देने वाले नेताओं को चुप कराने में लगे रहते हैं।

ग्रामीण इलाकों में Health व्यवस्था का बुरा हाल

झारखंड 80% ग्रामीण है, लेकिन यहां Health केंद्रों की हालत सबसे खराब है। कोल्हान, संथाल पर्गना जैसे आदिवासी इलाकों में डॉक्टर आने ही नहीं चाहते। एक डॉक्टर को 10 गांवों की जिम्मेदारी दी जाती है। नतीजा? प्रसव के समय महिलाओं को 50-50 किमी पैदल चलना पड़ता है।

COVID के बाद स्थिति और बिगड़ गई। टीकाकरण दर 60% से नीचे है। कुपोषण से ग्रामीण बच्चे प्रभावित हैं, लेकिन आंगनबाड़ी केंद्रों पर दूध-भोजन पहुंच ही नहीं पाता। Health व्यवस्था का यह हाल देखकर लगता है, सरकार गरीबों की जान की परवाह नहीं करती।

सरकार की मंशा नई बिल्डिंगें या वोट बैंक?

सरकार नई बिल्डिंगें बनाकर फोटो खिंचवाती है, लेकिन अंदर की व्यवस्था सुधारने को तैयार नहीं। सरायकेला अस्पताल इसका जीता-जागता उदाहरण है। डेढ़ साल से तैयार, लेकिन उद्घाटन नहीं। क्या ये सियासी साजिश है? विपक्षी नेता के प्रयास से बना अस्पताल सरकार को खटक रहा है?

बजट आवंटन देखिए – 2025-26 में स्वास्थ्य पर 5000 करोड़ का बजट, लेकिन 30% ही खर्च हुआ। बाकी PR और विज्ञापनों में उड़ा। HIV संक्रमित रक्त चढ़ाने को ‘छोटी गलती’ बताना सरकार की संवेदनहीनता दिखाता है। आदिवासियों पर लाठीचार्ज? वो तो ‘आंदोलन रोकने’ के नाम पर होता है। झारखंड Health व्यवस्था को सुधारने की बजाय, सरकार सड़कों पर उतरने की धमकी देने वालों को दबाती है।

भ्रष्टाचार और स्टाफ की कमी जड़ें कहां?

राज्य में 40% डॉक्टर पद खाली हैं। नर्सों की कमी 50%। भ्रष्टाचार से दवाएं काली बाजार में बिकती हैं। एक सर्वे में पाया गया कि 60% मरीजों को सही दवा नहीं मिलती। IT सिस्टम लागू करने की कोशिशें फेल हो गईं, क्योंकि ठेकेदार भाग गए।

समाधान के रास्ते जनता सड़कों पर उतरेगी?

झारखंड Health व्यवस्था सुधारने के लिए क्या करें? सबसे पहले, तैयार अस्पतालों को तुरंत शुरू करें। स्टाफ भर्ती करें, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएं। जनरेटर, सोलर पैनल हर अस्पताल में लगाएं। PPP मॉडल से प्राइवेट पार्टनरशिप बढ़ाएं।

विपक्ष को सरायकेला अस्पताल शुरू करने दें। जनता को जागरूक करें – RTI दाखिल करें, सोशल मीडिया पर आवाज उठाएं। अगर मौतें न रुकीं, तो सड़क पर उतरना पड़ेगा। मरांग बुरु दिवंगत आत्माओं को शांति दें, परिजनों को धैर्य दें। लेकिन सरकार को झकझोरना जरूरी है।

झारखंड Health व्यवस्था का यह हाल बर्दाश्त से बाहर है। बिनीता जैसी मौतें संस्थागत हत्या हैं। सरकार नई बिल्डिंगों के चक्कर में जनता की जान जोखिम में डाल रही है। सरायकेला अस्पताल शुरू करें, लापरवाही बंद करें। अगर नहीं सुना, तो जनता सड़कों पर उतरेगी। आइए, हम सब मिलकर आवाज उठाएं