जमशेदपुर: भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय (MoE) के निर्देशों के अनुरूप राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान NIT जमशेदपुर में आयोजित पांच दिवसीय फैकल्टी अपग्रेडेशन कार्यक्रम के अंतर्गत संकाय सदस्यों को छात्र मार्गदर्शन, मनोसामाजिक कल्याण, परामर्श सहायता प्रणाली तथा आधुनिक शिक्षण पद्धतियों से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रम का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के समग्र विकास, मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक उत्कृष्टता और छात्र-केंद्रित शिक्षण वातावरण को मजबूत बनाना है।
यह कार्यक्रम संस्थान के निदेशक प्रो. गौतम सूत्रधार के नेतृत्व में आयोजित किया जा रहा है, जो शिक्षा की गुणवत्ता में निरंतर सुधार और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देने के लिए जाने जाते हैं। कार्यक्रम शिक्षा मंत्रालय की उस व्यापक परिकल्पना का हिस्सा है, जिसके तहत देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र कल्याण और अकादमिक नवाचार को बढ़ावा दिया जा रहा है।
छात्र-केंद्रित शिक्षा को मजबूत बनाने का प्रयास
फैकल्टी अपग्रेडेशन कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य केवल शिक्षकों के ज्ञान और कौशल को विकसित करना ही नहीं है, बल्कि उन्हें विद्यार्थियों की बदलती आवश्यकताओं और चुनौतियों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाना भी है।

आज के समय में विद्यार्थियों को केवल शैक्षणिक दबाव ही नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। ऐसे में शिक्षकों की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि वे मार्गदर्शक, प्रेरक और सलाहकार के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं।
इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम के दूसरे दिन विशेष रूप से छात्र मार्गदर्शन कौशल और परिणाम-आधारित शिक्षण पद्धति पर केंद्रित सत्र आयोजित किए गए।
छात्रों की दृश्य और अदृश्य चुनौतियों की पहचान पर विशेषज्ञ व्याख्यान
कार्यक्रम का पहला तकनीकी सत्र प्रातः 10 बजे से 11:30 बजे तक आयोजित किया गया। इस सत्र का विषय था “छात्रों द्वारा सामना की जाने वाली दृश्य एवं अदृश्य बाधाओं की पहचान”।
सत्र का संचालन श्री विष्णु सुरेश, साइकियाट्रिक सोशल वर्क ट्यूटर, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री (सीआईपी), रांची द्वारा किया गया।
अपने व्याख्यान में उन्होंने विद्यार्थियों के समक्ष आने वाली विभिन्न चुनौतियों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कई बार छात्रों की समस्याएं केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव, पारिवारिक परिस्थितियों, आत्मविश्वास की कमी, भावनात्मक असंतुलन तथा व्यवहारिक कठिनाइयों से भी जूझते हैं।
उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि फैकल्टी सदस्यों को विद्यार्थियों की समस्याओं की प्रारंभिक पहचान करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए, ताकि समय रहते आवश्यक सहायता और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सके।
मनोसामाजिक कल्याण और मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष चर्चा
व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक कल्याण पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
विशेषज्ञ ने बताया कि वर्तमान प्रतिस्पर्धी वातावरण में छात्र तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसे में शिक्षकों को विद्यार्थियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों को समझना चाहिए और उन्हें उचित सहायता प्रदान करनी चाहिए।
उन्होंने साक्ष्य-आधारित मार्गदर्शन पद्धतियों, मनोसामाजिक हस्तक्षेप रणनीतियों तथा भावनात्मक सहयोग के महत्व पर प्रकाश डाला। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि शिक्षकों की सकारात्मक भूमिका विद्यार्थियों में मानसिक दृढ़ता, आत्मविश्वास और भावनात्मक संतुलन विकसित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
समावेशी और सुरक्षित शिक्षण वातावरण की आवश्यकता
सत्र के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसा वातावरण तैयार किया जाना चाहिए जहां प्रत्येक छात्र स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और स्वीकार्य महसूस करे।
विशेषज्ञों ने कहा कि समावेशी शिक्षा केवल विविध पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों को अवसर प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके लिए अनुकूल और सहयोगात्मक वातावरण तैयार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इस प्रकार का वातावरण विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता, आत्मविश्वास और अकादमिक प्रदर्शन को बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध होता है।
आउटकम-बेस्ड एजुकेशन और सक्रिय शिक्षण पद्धति पर दूसरा सत्र
कार्यक्रम का दूसरा तकनीकी सत्र प्रातः 11:30 बजे से दोपहर 1 बजे तक आयोजित किया गया। इस सत्र का विषय था “आउटकम-बेस्ड एजुकेशन (OBE) एवं सक्रिय शिक्षण पद्धति (Active Pedagogy)”।
इस सत्र का संचालन सुश्री एन. टी. रूपा, साइकियाट्रिक प्रोफेशनल, कोलकाता द्वारा किया गया।
उन्होंने परिणाम-आधारित शिक्षा की अवधारणा को विस्तार से समझाते हुए बताया कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली में केवल पाठ्यक्रम पूरा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि विद्यार्थी वास्तव में अपेक्षित ज्ञान, कौशल और दक्षताओं को प्राप्त कर रहे हैं या नहीं।
शिक्षार्थी-केंद्रित शिक्षण मॉडल पर जोर
सुश्री रूपा ने अपने व्याख्यान में शिक्षार्थी-केंद्रित शिक्षण पद्धतियों के महत्व को रेखांकित किया।
उन्होंने बताया कि पारंपरिक शिक्षण मॉडल की तुलना में छात्र-केंद्रित शिक्षा विद्यार्थियों को अधिक सक्रिय, सहभागी और आत्मनिर्भर बनाती है।
इसके माध्यम से विद्यार्थी केवल जानकारी प्राप्त नहीं करते, बल्कि उसे समझते हैं, विश्लेषण करते हैं और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में लागू करने की क्षमता भी विकसित करते हैं।
दक्षता मानचित्रण और रचनात्मक संरेखण पर विस्तृत चर्चा
सत्र के दौरान पाठ्यक्रम परिणामों के रचनात्मक संरेखण (Constructive Alignment) और दक्षता मानचित्रण (Competency Mapping) जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा की गई।
विशेषज्ञ ने बताया कि शिक्षण प्रक्रिया, अधिगम परिणाम और मूल्यांकन प्रणाली के बीच समन्वय स्थापित करना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आधारशिला है।
जब पाठ्यक्रम की संरचना और मूल्यांकन प्रणाली निर्धारित शिक्षण परिणामों के अनुरूप होती है, तब विद्यार्थियों का अधिगम अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुखी बनता है।
सक्रिय अधिगम तकनीकों ने खींचा ध्यान
कार्यक्रम में सक्रिय अधिगम तकनीकों (Active Learning Techniques) पर विशेष जोर दिया गया।
इस दौरान समूह चर्चा, केस स्टडी, प्रोजेक्ट आधारित शिक्षण, सहयोगात्मक अधिगम और अनुभवात्मक शिक्षण मॉडल जैसी आधुनिक पद्धतियों पर विचार-विमर्श किया गया।
विशेषज्ञों ने बताया कि ये तकनीकें विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, समस्या समाधान क्षमता, नेतृत्व कौशल और रचनात्मकता को विकसित करने में अत्यंत प्रभावी हैं।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए सतत सुधार की आवश्यकता
सत्र में यह भी बताया गया कि शिक्षा प्रणाली में निरंतर सुधार और नवाचार आवश्यक है।
प्रारूपिक मूल्यांकन रणनीतियों, सतत फीडबैक प्रणाली और गुणवत्ता सुधार उपायों के माध्यम से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि बदलती तकनीक और वैश्विक आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण पद्धतियों का निरंतर विकास उच्च शिक्षा संस्थानों की प्राथमिकता होनी चाहिए।
संकाय सदस्यों ने निभाई सक्रिय भूमिका
कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के संकाय सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और विशेषज्ञों के साथ संवाद स्थापित किया।
सत्रों के दौरान प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए तथा छात्र कल्याण और शिक्षण सुधार से जुड़े अनेक विषयों पर विचार-विमर्श किया।
इस अवसर पर संस्थान के उप-निदेशक प्रो. आर. वी. शर्मा, विभिन्न अधिष्ठाता, विभागाध्यक्ष तथा वरिष्ठ शिक्षाविद भी उपस्थित रहे।
आयोजन समिति की महत्वपूर्ण भूमिका
कार्यक्रम का आयोजन प्रो. सरोज कुमार सारंगी, अधिष्ठाता (छात्र कल्याण) एवं कुलसचिव (प्रभारी), तथा प्रो. दिलीप कुमार यादव, अधिष्ठाता (संकाय कल्याण) के मार्गदर्शन में किया गया।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. कुमारी नम्रता एवं डॉ. एस. सक्थिवेल रहे।
इसके अतिरिक्त डॉ. विजय कुमार डल्ला, डॉ. कुणाल सिंह, डॉ. संगीता कुमारी और डॉ. पौलामी माजी ने समन्वयक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं श्री अजिताभ गौतम और श्रीमती पुष्पा बाला महतो ने सह-समन्वयक के रूप में कार्यक्रम के सफल संचालन में योगदान दिया।
उच्च शिक्षा में परिवर्तनकारी पहल की ओर बढ़ता कदम
कार्यक्रम के समापन अवसर पर सभी संसाधन व्यक्तियों, आयोजकों और प्रतिभागियों को उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए धन्यवाद दिया गया।
यह फैकल्टी अपग्रेडेशन कार्यक्रम शिक्षा मंत्रालय की उस सोच को साकार करता है जिसमें उच्च शिक्षा संस्थानों को केवल ज्ञान प्रदान करने वाले केंद्र नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के समग्र विकास, मानसिक स्वास्थ्य, नवाचार, नेतृत्व और सामाजिक जिम्मेदारी को विकसित करने वाले संस्थान के रूप में विकसित किया जाना है।
NIT जमशेदपुर द्वारा आयोजित यह पहल छात्र-केंद्रित, समावेशी और अकादमिक रूप से उत्तरदायी शिक्षण वातावरण के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है, जो भविष्य में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में सहायक होगी।
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