कोटा: Railway राजधानी एक्सप्रेस के करीब चार घंटे देरी से दिल्ली पहुंचने के कारण एक दंपत्ति की केरल जाने वाली फ्लाइट छूट गई। इस वजह से उन्हें अगले दिन नई फ्लाइट के टिकट काफी अधिक कीमत पर खरीदने पड़े। मामले को उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ा मानते हुए जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (फोरम) ने दंपत्ति के पक्ष में फैसला सुनाया और रेलवे को हर्जाना देने का आदेश दिया।
Railway ने इस आदेश को राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिल सकी। आयोग ने जिला फोरम के फैसले को बरकरार रखते हुए दंपत्ति को 69 हजार रुपये से अधिक का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
क्या था पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, कोटा निवासी एक दंपत्ति राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली जा रहे थे। दिल्ली पहुंचने के बाद उन्हें केरल के लिए निर्धारित फ्लाइट पकड़नी थी। लेकिन राजधानी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से लगभग चार घंटे देरी से दिल्ली पहुंची।

ट्रेन की देरी के कारण दंपत्ति समय पर एयरपोर्ट नहीं पहुंच सके और उनकी फ्लाइट छूट गई। इसके बाद उन्हें अपनी यात्रा जारी रखने के लिए अगले दिन के टिकट खरीदने पड़े, जिनकी कीमत पहले से काफी अधिक थी। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक परेशानी का भी सामना करना पड़ा।
उपभोक्ता फोरम में पहुंचा मामला
Railway से उचित राहत नहीं मिलने पर दंपत्ति ने जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान दंपत्ति ने ट्रेन की देरी, फ्लाइट छूटने और अतिरिक्त खर्च के दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत किए।
फोरम ने माना कि ट्रेन की असामान्य देरी के कारण यात्रियों को वास्तविक आर्थिक नुकसान हुआ है। साथ ही उन्हें मानसिक तनाव और असुविधा भी झेलनी पड़ी। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए फोरम ने रेलवे को मुआवजा देने का आदेश दिया।
राज्य आयोग ने भी बरकरार रखा फैसला
जिला फोरम के आदेश के खिलाफ रेलवे ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की। हालांकि आयोग ने मामले की समीक्षा के बाद पाया कि यात्रियों को हुई हानि वास्तविक और प्रमाणित थी।
आयोग ने कहा कि यदि किसी सेवा में कमी के कारण उपभोक्ता को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है तो उसे उचित राहत मिलनी चाहिए। इसी आधार पर जिला फोरम के आदेश को सही ठहराते हुए रेलवे की अपील खारिज कर दी गई।
69 हजार रुपये से अधिक का मिलेगा हर्जाना
फैसले के अनुसार रेलवे को दंपत्ति को कुल 69 हजार रुपये से अधिक की राशि अदा करनी होगी। इसमें अतिरिक्त टिकट खर्च, अन्य आर्थिक नुकसान तथा मानसिक कष्ट के लिए निर्धारित मुआवजा शामिल है।
यह फैसला उन यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में लापरवाही या देरी के कारण नुकसान उठाते हैं और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होते।
यात्रियों के अधिकारों को मिला बल
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों को मजबूत करने वाला है। यदि किसी सेवा प्रदाता की कमी के कारण उपभोक्ता को नुकसान होता है, तो वह उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत राहत पाने का हकदार है।
Railway एयरलाइंस, परिवहन कंपनियों और अन्य सेवा प्रदाताओं के खिलाफ भी उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है, बशर्ते नुकसान के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हों।
महत्वपूर्ण संदेश
यह मामला बताता है कि यात्रा के दौरान हुई देरी या सेवा में कमी से यदि यात्रियों को आर्थिक हानि होती है तो वे कानूनी उपाय अपना सकते हैं। उपभोक्ता फोरम ऐसे मामलों में यात्रियों को न्याय दिलाने का प्रभावी मंच साबित हो रहा है।
फिलहाल रेलवे की ओर से इस फैसले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मामले में आगे उच्च स्तर पर अपील की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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