नई दिल्ली: अमेरिका में हुए 11 सितंबर 2001 के भीषण आतंकी हमलों की 25वीं बरसी से पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने कई पुराने खुफिया दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं। इन दस्तावेजों में अल-कायदा के तत्कालीन प्रमुख ओसामा बिन लादेन और उसके आतंकी नेटवर्क को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 9/11 हमले से करीब तीन साल पहले, यानी वर्ष 1998 में ही भारत का नाम उन देशों में शामिल था, जिन्हें लादेन का नेटवर्क संभावित आतंकी निशाने के तौर पर देख रहा था।

हालांकि, सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में भारत के किसी खास शहर, इमारत, व्यक्ति या स्थान को निशाना बनाने की विस्तृत योजना का उल्लेख नहीं है। न ही किसी संभावित हमले की तारीख या ऑपरेशन से जुड़ी कोई स्पष्ट जानकारी सामने आई है। ऐसे में इन दस्तावेजों से यह तो पता चलता है कि भारत को संभावित निशानों में शामिल किया गया था, लेकिन इससे भारत में किसी विशेष हमले की पूरी साजिश का प्रमाण नहीं मिलता।

CIA ने सार्वजनिक किए पुराने खुफिया दस्तावेज

9/11 आतंकी हमलों की 25वीं बरसी के अवसर पर CIA ने अमेरिकी राष्ट्रपतियों को दी गई पुरानी खुफिया जानकारी से जुड़े कई दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं। इनमें 70 से अधिक प्रेसिडेंशियल दस्तावेज और 100 से ज्यादा पन्नों की सामग्री शामिल है।

प्रेसिडेंशियल डेली ब्रीफ यानी PDB ऐसे बेहद महत्वपूर्ण खुफिया दस्तावेज होते हैं, जिनके जरिए अमेरिकी खुफिया एजेंसियां राष्ट्रपति को देश और दुनिया में मौजूद संभावित सुरक्षा खतरों की जानकारी देती थीं। इन्हीं दस्तावेजों में अल-कायदा और ओसामा बिन लादेन की गतिविधियों को लेकर उस समय अमेरिकी सरकार की चिंताओं का भी जिक्र मिलता है।

1998 की रिपोर्ट में भारत का नाम

28 अगस्त 1998 को तैयार की गई एक खुफिया ब्रीफ का शीर्षक था—‘Bin Laden terrorist network still a threat’। इस रिपोर्ट में ओसामा बिन लादेन के आतंकी नेटवर्क और उसके संभावित हमलों को लेकर अमेरिकी प्रशासन को जानकारी दी गई थी।

रिपोर्ट में बताया गया था कि लादेन का नेटवर्क कई देशों में आतंकी गतिविधियों के विकल्प तलाश रहा था। इन संभावित देशों में भारत, पाकिस्तान, मिस्र, कुवैत, सऊदी अरब, यमन और युगांडा का नाम सामने आया था। रिपोर्ट में संभवतः नाइजीरिया का भी उल्लेख था।

भारत का नाम इस सूची में होना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह 9/11 हमले से कई साल पहले की खुफिया जानकारी थी। हालांकि, रिपोर्ट में भारत को लेकर किसी खास स्थान या व्यक्ति का उल्लेख नहीं किया गया था।

भारत में किसी खास हमले की योजना का प्रमाण नहीं

CIA के सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें भारत के खिलाफ किसी विशेष आतंकी हमले की विस्तृत योजना सामने नहीं आती।

दस्तावेजों में न तो किसी भारतीय शहर का नाम स्पष्ट रूप से दिया गया है और न ही किसी इमारत या महत्वपूर्ण व्यक्ति को लक्ष्य बताया गया है। इसके अलावा हमले की संभावित तारीख, आतंकियों की संख्या, ऑपरेशन की रणनीति या किसी विशेष साजिश का भी विवरण नहीं है।

इसलिए उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि 1998 में ही भारत में किसी विशेष आतंकी हमले की पूरी योजना तैयार हो चुकी थी। दस्तावेज केवल यह संकेत देते हैं कि भारत को लादेन के नेटवर्क द्वारा संभावित निशाने वाले देशों में गिना जा रहा था।

अमेरिका और ब्रिटेन को भी बनाया जा सकता था निशाना

CIA की रिपोर्ट में अमेरिका और ब्रिटेन के खिलाफ संभावित आतंकी हमलों को लेकर भी चिंता जताई गई थी। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को आशंका थी कि ओसामा बिन लादेन आगे भी पश्चिमी देशों के खिलाफ हमलों की योजना बना सकता है।

उस समय किसी खास लक्ष्य या हमले की निश्चित तारीख की जानकारी अमेरिकी एजेंसियों के पास नहीं थी। लेकिन लादेन के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को देखते हुए अमेरिकी अधिकारियों को खतरा गंभीर नजर आ रहा था।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि लादेन के सहयोगी और संपर्क दुनिया के कम से कम 60 देशों में मौजूद थे। इसका मतलब था कि उसका नेटवर्क केवल अफगानिस्तान या कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही नहीं था, बल्कि कई महाद्वीपों में फैला हुआ था।

उत्तरी अमेरिका यूरोप और एशिया में मजबूत नेटवर्क

CIA के आकलन के अनुसार ओसामा बिन लादेन के नेटवर्क की मौजूदगी उत्तरी अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया में भी थी। यही कारण था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को आशंका थी कि अलग-अलग देशों में मौजूद उसके संपर्कों का इस्तेमाल भविष्य में आतंकी हमलों के लिए किया जा सकता है।

उस समय अल-कायदा धीरे-धीरे एक अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन के रूप में अपनी क्षमता बढ़ा रहा था। प्रशिक्षण शिविर, वित्तीय नेटवर्क, संपर्क और अलग-अलग देशों में मौजूद सहयोगी इसके संचालन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

अमेरिकी मिसाइल हमलों के बाद भी सक्रिय रहा अल-कायदा

यह खुफिया रिपोर्ट अगस्त 1998 में अफगानिस्तान और सूडान में अल-कायदा से जुड़े ठिकानों पर अमेरिका द्वारा किए गए मिसाइल हमलों के कुछ समय बाद तैयार की गई थी।

केन्या और तंजानिया में अमेरिकी दूतावासों पर हुए बम धमाकों के बाद अमेरिका ने लादेन के नेटवर्क के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की थी। इन हमलों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी।

लेकिन अमेरिकी हमलों के बावजूद ओसामा बिन लादेन और उसके कुछ प्रमुख सहयोगी बच गए। उनका संचार नेटवर्क भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया। CIA के आकलन के मुताबिक, कुछ प्रशिक्षण शिविरों में गतिविधियां दोबारा शुरू हो गई थीं और कुछ शिविरों को दूसरी जगह स्थानांतरित करने की तैयारी चल रही थी।

नए आतंकियों को दी जा रही थी ट्रेनिंग

खुफिया जानकारी के अनुसार, अमेरिकी कार्रवाई में मारे गए लड़ाकों की जगह नए लोगों को तैयार किया जा रहा था। इन्हें अलग-अलग प्रशिक्षण शिविरों में भेजकर भविष्य की आतंकी गतिविधियों के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा था।

इससे अमेरिकी एजेंसियों को अंदाजा हो गया था कि केवल कुछ ठिकानों पर हमला करने से लादेन के पूरे नेटवर्क को खत्म करना आसान नहीं होगा। संगठन की संरचना और उसके अंतरराष्ट्रीय संपर्क उसे दोबारा सक्रिय होने में मदद कर रहे थे।

1998 से 2001 तक अमेरिका को मिलती रही चेतावनी

ओसामा बिन लादेन से अमेरिका को खतरे की जानकारी अचानक 11 सितंबर 2001 से पहले सामने नहीं आई थी। 1998 से लेकर 2001 तक अमेरिकी राष्ट्रपतियों को कई मौकों पर लादेन के नेटवर्क और अमेरिका को निशाना बनाए जाने की संभावनाओं के बारे में खुफिया जानकारी दी गई।

इन रिपोर्टों से पता चलता है कि अमेरिकी एजेंसियां लगातार लादेन के बढ़ते प्रभाव और उसके संभावित हमलों को लेकर चिंतित थीं। हालांकि, इतनी गंभीर आशंकाओं के बावजूद 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर ऐसा हमला हुआ जिसने पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था को बदल दिया।

11 सितंबर 2001 को हुआ था सबसे बड़ा आतंकी हमला

11 सितंबर 2001 की सुबह अल-कायदा के 19 आतंकियों ने चार यात्री विमानों का अपहरण कर लिया। दो विमान न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ट्विन टावर्स से टकराए। भीषण आग और भारी नुकसान के बाद दोनों इमारतें ढह गईं।

तीसरा विमान वर्जीनिया स्थित अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय पेंटागन से जा टकराया। चौथा विमान यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 93 था। इस विमान में मौजूद यात्रियों ने अपहरणकर्ताओं का विरोध करने की कोशिश की। इसके बाद विमान पेंसिल्वेनिया के एक मैदान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

माना जाता है कि फ्लाइट 93 का संभावित निशाना वॉशिंगटन का कोई महत्वपूर्ण सरकारी भवन हो सकता था, जिसमें व्हाइट हाउस या अमेरिकी कैपिटल शामिल हो सकता है।

इन हमलों में 19 अपहरणकर्ताओं समेत करीब 3,000 लोगों की मौत हुई थी।

9/11 के बाद अमेरिका ने शुरू किया अफगानिस्तान युद्ध

9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने अल-कायदा और उसके प्रमुख ओसामा बिन लादेन के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी। उस समय तालिबान के नियंत्रण वाले अफगानिस्तान में लादेन और अल-कायदा के कई नेताओं को ठिकाना मिला हुआ था।

अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य अभियान शुरू किया। इसके बावजूद ओसामा बिन लादेन कई वर्षों तक अमेरिकी एजेंसियों की पकड़ से बाहर रहा।

आखिरकार 2 मई 2011 को अमेरिकी नेवी सील कमांडो ने पाकिस्तान के एबटाबाद में एक परिसर पर कार्रवाई की। इसी ऑपरेशन में ओसामा बिन लादेन मारा गया। एबटाबाद इस्लामाबाद से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित है।

लादेन की मौत के बाद भी खत्म नहीं हुआ अल-कायदा

ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अल-कायदा को बड़ा झटका लगा, लेकिन संगठन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। उसके बाद अयमान अल-जवाहिरी ने संगठन की कमान संभाली। बाद में उसे भी अमेरिकी कार्रवाई में मार दिया गया।

इसके बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों में अल-कायदा से जुड़े संगठनों और नेटवर्क की गतिविधियां समय-समय पर सामने आती रही हैं। इससे पता चलता है कि किसी बड़े आतंकी संगठन का नेतृत्व खत्म होने के बावजूद उसके नेटवर्क और विचारधारा को पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं होता।

भारत का नाम सामने आना क्यों है महत्वपूर्ण?

CIA के नए सार्वजनिक दस्तावेजों में भारत का नाम सामने आना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि 1998 में ही ओसामा बिन लादेन का नेटवर्क भारत को संभावित आतंकी निशाने वाले देशों की सूची में देख रहा था।

लेकिन इस जानकारी की व्याख्या करते समय सावधानी जरूरी है। दस्तावेज में भारत के किसी विशेष शहर, स्थान, व्यक्ति या प्रतिष्ठान को निशाना बनाने की जानकारी नहीं है। साथ ही किसी निर्धारित तारीख या ऑपरेशन की विस्तृत योजना भी सामने नहीं आई है।

इसलिए उपलब्ध दस्तावेजों से फिलहाल यही निष्कर्ष निकलता है कि भारत लादेन के नेटवर्क की संभावित हमले की सोच में शामिल देशों में था। लेकिन यह दस्तावेज भारत में किसी खास आतंकी हमले की विस्तृत साजिश का प्रमाण नहीं देता।

25 साल बाद सामने आई खुफिया तस्वीर

9/11 हमले के 25 साल बाद सार्वजनिक हुई यह सामग्री उस दौर की वैश्विक आतंकी चुनौती को समझने में महत्वपूर्ण है। दस्तावेज यह दिखाते हैं कि 2001 से पहले ही ओसामा बिन लादेन का नेटवर्क कई देशों में फैल चुका था और अमेरिकी खुफिया एजेंसियां उसकी गतिविधियों को लेकर लगातार चेतावनी दे रही थीं।

भारत का नाम भी उसी व्यापक संभावित खतरे के संदर्भ में सामने आया है। हालांकि, इस दस्तावेज से भारत के खिलाफ किसी खास हमले की योजना की पुष्टि नहीं होती। ऐसे में इस खुलासे का सबसे अहम पहलू यह है कि 9/11 से पहले ही लादेन का आतंकी नेटवर्क एक अंतरराष्ट्रीय खतरे के रूप में पहचाना जा चुका था और भारत भी उन देशों में शामिल था, जिन पर उसकी नजर होने की आशंका अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने दर्ज की थी।