जमशेदपुर: झारखंड बांग्ला भाषा उन्नयन समिति ने साहित्य, समाजसेवा, रक्तदान जागरूकता पोटका प्रखंड निवासी Sunil Kumar Dey को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की मांग उठाई है। इस संबंध में बुधवार को समिति के एक प्रतिनिधिमंडल ने पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त और धालभूम के अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय में मांगपत्र सौंपा। समिति ने अपने आवेदन में सुनील कुमार दे के साहित्यिक और सामाजिक योगदान का उल्लेख करते हुए उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की मांग की।
समिति के अनुसार, सुनील कुमार दे ने बांग्ला और हिंदी भाषा में कुल 35 पुस्तकों का प्रकाशन कर साहित्य जगत में योगदान दिया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने पोटका और राजनगर प्रखंड के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए लगातार प्रयास किए हैं। समिति का दावा है कि उनकी प्रेरणा और पहल से अब तक 60 से अधिक रक्तदान शिविर आयोजित हो चुके हैं। वहीं, बांग्ला भाषा और संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य से माताजी आश्रम के सहयोग से उनके नेतृत्व में 34 ‘अपूर पाठशालाएं’ भी खोली गई हैं।
साहित्य के क्षेत्र में 35 पुस्तकों का योगदान
झारखंड बांग्ला भाषा उन्नयन समिति ने अपने मांगपत्र में सुनील कुमार दे के साहित्यिक कार्यों को प्रमुखता से रेखांकित किया है। समिति के मुताबिक, पोटका प्रखंड के निवासी सुनील कुमार दे ने बांग्ला और हिंदी दोनों भाषाओं में लेखन करते हुए कुल 35 पुस्तकों का प्रकाशन कराया है।

समिति का कहना है कि क्षेत्रीय भाषाओं और साहित्य के विकास में लेखकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। साहित्य के माध्यम से समाज की संस्कृति, परंपराओं, विचारों और जीवन के विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्ति मिलती है। ऐसे में दोनों भाषाओं में लेखन करने वाले सुनील कुमार दे के योगदान को व्यापक स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए।
प्रतिनिधिमंडल ने अपने आवेदन में उनके साहित्यिक कार्यों को सम्मान के योग्य बताते हुए केंद्र सरकार से उन्हें पद्मश्री पुरस्कार प्रदान करने पर विचार करने का आग्रह किया। समिति का मानना है कि साहित्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में लगातार काम करने वाले लोगों को प्रोत्साहन मिलने से अन्य लोगों को भी समाजहित में कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रक्तदान जागरूकता की पहल
Sunil Kumar Dey के सामाजिक योगदान का उल्लेख करते हुए समिति ने पोटका और राजनगर प्रखंड के सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में रक्तदान के प्रति जागरूकता फैलाने के उनके प्रयासों को भी महत्वपूर्ण बताया है।
समिति की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, सुनील कुमार दे की प्रेरणा और प्रयासों से अब तक 60 से अधिक रक्तदान शिविरों का आयोजन हो चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में रक्तदान को लेकर जागरूकता फैलाना और लोगों को इस सामाजिक कार्य से जोड़ना ऐसे अभियानों का प्रमुख उद्देश्य रहा है।
रक्तदान जरूरतमंद मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके लिए नियमित जागरूकता अभियान और स्वैच्छिक रक्तदाताओं की भागीदारी आवश्यक होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिशा में किए जाने वाले प्रयासों से लोगों को रक्तदान के महत्व के बारे में जानकारी मिल सकती है और जरूरत के समय रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायता मिल सकती है।
समिति ने मांगपत्र में इन प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि सुनील कुमार दे का सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पण उन्हें सम्मानित किए जाने योग्य बनाता है। प्रतिनिधिमंडल ने प्रशासन से आग्रह किया कि उनके योगदान को संबंधित स्तर पर सामने लाया जाए।
बांग्ला भाषा के संरक्षण के लिए खोली गईं 34 ‘अपूर पाठशालाएं’
मांगपत्र में बांग्ला भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए सुनील कुमार दे की भूमिका को भी प्रमुखता दी गई है। समिति के अनुसार, माताजी आश्रम के सहयोग से उनके नेतृत्व में अब तक 34 ‘अपूर पाठशालाएं’ खोली गई हैं।
समिति का कहना है कि क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण केवल साहित्यिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। बच्चों को मातृभाषा में पढ़ने-लिखने का अवसर देना, भाषा के प्रति रुचि विकसित करना और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना भाषा संरक्षण के प्रयासों में अहम भूमिका निभाता है।
इसी उद्देश्य से संचालित ‘अपूर पाठशालाओं’ को समिति ने बांग्ला भाषा के प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार की पाठशालाओं के संचालन से बच्चों को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिल सकता है।
समिति ने अपने आवेदन में इन पाठशालाओं के संचालन का उल्लेख करते हुए कहा कि सुनील कुमार दे का योगदान साहित्य, शिक्षा और भाषा संरक्षण जैसे विभिन्न क्षेत्रों तक फैला हुआ है। इसी आधार पर उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की मांग की गई है।
45 वर्षों से समाजसेवा और आध्यात्मिक कार्यों में सक्रियता का दावा
झारखंड बांग्ला भाषा उन्नयन समिति ने सुनील कुमार दे के लंबे सामाजिक जुड़ाव को भी अपने मांगपत्र का आधार बनाया है। समिति की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, हाता स्थित माताजी आश्रम से जुड़कर वह पिछले लगभग 45 वर्षों से आध्यात्मिक गतिविधियों और जनसेवा के कार्यों में योगदान दे रहे हैं।
समिति का कहना है कि समाजसेवा के माध्यम से लोगों को सकारात्मक दिशा देना, सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी बढ़ाना और जरूरतमंदों के हित में कार्य करना किसी भी समाज के विकास के लिए आवश्यक है। सुनील कुमार दे के कार्यों को इसी व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखते हुए समिति ने उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की मांग की है।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि साहित्यिक गतिविधियों, रक्तदान जागरूकता, मातृभाषा के संरक्षण और जनसेवा के क्षेत्र में उनका काम समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने का प्रयास है। समिति के अनुसार, ऐसे कार्यों को सम्मान मिलने से सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाले अन्य लोगों का भी उत्साह बढ़ सकता है।
हालांकि, पद्मश्री पुरस्कार के लिए किसी व्यक्ति के नाम पर अंतिम निर्णय संबंधित सरकारी प्रक्रिया के तहत लिया जाता है। समिति ने फिलहाल सुनील कुमार दे के योगदान को सामने रखते हुए उनके नाम पर विचार करने का अनुरोध किया है।
उपायुक्त और अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय में सौंपा गया आवेदन
सुनील कुमार दे को पद्मश्री पुरस्कार दिलाने की मांग को लेकर समिति के प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार, 30 सितंबर 2026 को पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त तथा धालभूम के अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय में मांगपत्र सौंपा।
आवेदन में उनके साहित्यिक, सामाजिक और भाषाई योगदान से संबंधित विभिन्न बिंदुओं को शामिल किया गया। समिति ने अपने दावे के समर्थन में विभिन्न दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। इसके अतिरिक्त सुनील कुमार दे की ओर से किए गए ऑनलाइन आवेदन की प्रति भी मांगपत्र के साथ सौंपी गई।
प्रतिनिधिमंडल का उद्देश्य संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष उनके कार्यों की जानकारी रखना और पद्मश्री पुरस्कार के लिए उनके नाम पर विचार किए जाने की मांग को आगे बढ़ाना था।
समिति ने आग्रह किया कि सुनील कुमार दे के लंबे समय से किए जा रहे सामाजिक और साहित्यिक कार्यों को उचित पहचान मिले। आवेदन के माध्यम से उनके योगदान से संबंधित तथ्यों और दस्तावेजों को संबंधित कार्यालयों तक पहुंचाने की पहल की गई।
प्रतिनिधिमंडल में करुणामय मंडल और राजेश राय रहे शामिल
मांगपत्र सौंपने वाले प्रतिनिधिमंडल में समाजसेवी, साहित्यकार और पूर्व जिला परिषद सदस्य करुणामय मंडल प्रमुख रूप से शामिल थे। इसके अलावा समिति के सचिव राजेश राय सहित अन्य प्रतिनिधियों की भी भागीदारी रही।
प्रतिनिधिमंडल ने सुनील कुमार दे के विभिन्न कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्य, रक्तदान, मातृभाषा संरक्षण और समाजसेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की मांग की जा रही है।
सदस्यों ने आवेदन के साथ संबंधित दस्तावेज और ऑनलाइन आवेदन की प्रति सौंपकर इस मांग को औपचारिक रूप से प्रशासन के समक्ष रखा। समिति की ओर से उम्मीद जताई गई कि उनके प्रयासों और उपलब्धियों पर उचित स्तर पर विचार किया जाएगा।
बांग्ला भाषा और समाजसेवा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की पहल
झारखंड बांग्ला भाषा उन्नयन समिति की यह पहल क्षेत्रीय साहित्य, मातृभाषा के संरक्षण और सामाजिक सेवा से जुड़े कार्यों को व्यापक पहचान दिलाने के प्रयास के रूप में सामने आई है। समिति ने सुनील कुमार दे के योगदान को आधार बनाते हुए पद्मश्री पुरस्कार के लिए उनके नाम पर विचार करने का आग्रह किया है।
समिति के अनुसार, 35 पुस्तकों का प्रकाशन, 60 से अधिक रक्तदान शिविरों के आयोजन में प्रेरक भूमिका, 34 ‘अपूर पाठशालाओं’ की स्थापना और माताजी आश्रम से जुड़कर लंबे समय से जनसेवा करना उनके कार्यक्षेत्र के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
अब इस मांग पर संबंधित स्तर पर क्या प्रक्रिया आगे बढ़ती है, यह देखना होगा। फिलहाल समिति ने मांगपत्र और संबंधित दस्तावेज सौंपकर अपनी मांग प्रशासन के समक्ष रख दी है।
मुख्य बात: झारखंड बांग्ला भाषा उन्नयन समिति ने सुनील कुमार दे के साहित्यिक, सामाजिक और भाषाई योगदान का हवाला देते हुए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की मांग की है। यह समिति की ओर से की गई मांग है; पुरस्कार की घोषणा या स्वीकृति की कोई जानकारी प्रेस विज्ञप्ति में नहीं दी गई है।
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