जमशेदपुर, 16 जून। कपाली थाना में एक आदिवासी युवती के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आने के बाद पूरे क्षेत्र में चर्चा का माहौल है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सरायकेला-खरसावां की पुलिस अधीक्षक निधि द्विवेदी ने तत्काल कार्रवाई करते हुए कपाली थाना प्रभारी धीरंजन कुमार, एएसआई मुकलेसुर रहमान और महिला आरक्षी कंचन को निलंबित कर दिया है। साथ ही पूरे मामले की विस्तृत जांच के आदेश दिए गए हैं।
मिली जानकारी के अनुसार, 26 वर्षीय अल्पना महाली को एक युवती के लापता होने के मामले में पूछताछ के लिए कपाली थाना बुलाया गया था। बताया जा रहा है कि वह शाम के समय थाना पहुंची थी। पीड़िता का आरोप है कि उसे कई घंटों तक थाने में रखा गया और लगातार पूछताछ की गई। उसने दावा किया है कि पूछताछ के दौरान उसके साथ मारपीट की गई और उस पर ऐसी जानकारी देने का दबाव बनाया गया, जो उसके अनुसार उसे मालूम ही नहीं थी।
युवती का कहना है कि रात करीब 11 बजे तक वह थाना परिसर में मौजूद रही। इस दौरान उसे बार-बार एक ही मामले को लेकर सवाल पूछे गए। आरोप है कि पूछताछ के दौरान उसके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार भी किया गया, जिससे उसके शरीर पर चोट के निशान पड़ गए। बाद में उसकी तबीयत बिगड़ गई और घर लौटने के बाद उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।


यह मामला केवल एक व्यक्ति की शिकायत नहीं, बल्कि कानून और मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े करता है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। वहीं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित करती है कि पूछताछ और जांच की प्रक्रिया कानूनी सीमाओं के भीतर हो। किसी भी व्यक्ति के साथ मारपीट या दबाव बनाकर बयान लेने की अनुमति कानून नहीं देता।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट द्वारा डी.के. बसु मामले में जारी दिशा-निर्देश भी पुलिस हिरासत और पूछताछ के दौरान नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को अनिवार्य बताते हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो यह केवल विभागीय गलती नहीं बल्कि कानूनी जवाबदेही का विषय भी बन सकता है।
मामले को और अधिक संवेदनशील इसलिए माना जा रहा है क्योंकि पीड़िता एक आदिवासी महिला है। अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधानों के तहत भी ऐसे मामलों की गंभीरता बढ़ जाती है। यदि किसी आदिवासी महिला को उसके सामाजिक दर्जे के कारण प्रताड़ित किया गया हो या उसके अधिकारों का हनन हुआ हो, तो संबंधित धाराएं लागू हो सकती हैं।
फिलहाल पुलिस प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है और वरिष्ठ अधिकारी मामले की निगरानी कर रहे हैं। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी निष्पक्ष जांच की मांग की है। अब सभी की नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी है, जो तय करेगी कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और आगे क्या कार्रवाई होगी। यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि कानून का शासन तभी मजबूत माना जाएगा जब वर्दी पहनने वाले भी कानून के दायरे में पूरी जवाबदेही के साथ काम करें।




















