बगोदर: जीटी रोड सिक्सलेन निर्माण परियोजना के लिए जमीन गिरिडीह जिले के Bagodar प्रखंड अंतर्गत अटका क्षेत्र के 1129 भू-रैयतों ने मुआवजा भुगतान में हो रही देरी के विरोध में मंगलवार को बगोदर अंचल कार्यालय के मुख्य द्वार पर धरना-प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पिछले करीब डेढ़ दशक से मुआवजे का भुगतान लंबित है, लेकिन अब तक उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया है।
धरना-प्रदर्शन के दौरान भू-रैयतों ने प्रशासन के समक्ष अपनी मांगें रखीं और मुआवजा निर्धारण में कथित असमानता पर सवाल उठाए। ग्रामीणों का कहना है कि जब जिले के 29 मौजों में अधिग्रहित जमीन के लिए आवासीय दर से मुआवजा निर्धारित किया गया है, तो अटका क्षेत्र के प्रभावित भू-रैयतों को कृषि दर से मुआवजा देने का आधार क्या है? प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि उनकी जमीन और मकानों की प्रकृति तथा वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उचित दर से मुआवजा दिया जाए।
धरने का नेतृत्व झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय सदस्य एवं बगोदर विधानसभा क्षेत्र के झामुमो नेता शत्रुघ्न प्रसाद मंडल ने किया। इस दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण और प्रभावित भू-रैयत मौजूद रहे। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि लंबे समय से लंबित मुआवजे के मामले में अब शीघ्र कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि प्रभावित परिवारों को राहत मिल सके।

1129 भू-रैयतों का मुआवजा भुगतान लंबित होने का आरोप
अटका क्षेत्र के भू-रैयतों का कहना है कि जीटी रोड सिक्सलेन परियोजना के निर्माण के दौरान उनकी जमीन और मकानों का अधिग्रहण किया गया था। इस परियोजना का उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाना और सड़क की क्षमता बढ़ाना है। हालांकि, परियोजना के लिए अपनी जमीन और मकान देने वाले प्रभावित परिवारों का दावा है कि उन्हें अब तक उचित मुआवजा नहीं मिला है।
ग्रामीणों के अनुसार, मुआवजा भुगतान में लंबे समय से हो रही देरी के कारण प्रभावित परिवारों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जमीन और मकान किसी भी परिवार की महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं। ऐसे में इनके अधिग्रहण के बाद समय पर उचित मुआवजा नहीं मिलने से लोगों की आजीविका, आवास और भविष्य की आर्थिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि मुआवजे का मामला वर्षों से लंबित रहने के कारण भू-रैयतों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। ग्रामीण चाहते हैं कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए लंबित भुगतान की स्थिति स्पष्ट करे और प्रभावित परिवारों को उनका अधिकार दिलाने के लिए आवश्यक कदम उठाए।
कृषि दर से मुआवजा देने पर ग्रामीणों ने उठाए सवाल
धरना-प्रदर्शन के दौरान मुआवजा निर्धारण की दर प्रमुख मुद्दा रही। भू-रैयतों ने सवाल उठाया कि जिले के 29 मौजों में जमीन के लिए आवासीय दर से मुआवजा निर्धारित किए जाने की बात कही जा रही है, जबकि अटका क्षेत्र के प्रभावित रैयतों को कृषि दर से मुआवजा देने की बात सामने आ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि जमीन की प्रकृति, उपयोग और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मुआवजे का निर्धारण किया जाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र की जमीन आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में रही है, तो उसके मूल्यांकन में संबंधित नियमों और निर्धारित मानकों का पालन किया जाना आवश्यक है।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि अटका क्षेत्र की जमीन और मकानों के मुआवजे के निर्धारण की प्रक्रिया की समीक्षा की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि प्रभावित भू-रैयतों के लिए किस दर से मुआवजा निर्धारित किया गया है और भुगतान में देरी के पीछे क्या कारण हैं।
हालांकि, आवासीय और कृषि दर के निर्धारण से संबंधित प्रशासनिक दस्तावेजों तथा आधिकारिक पक्ष की जानकारी सामने आने के बाद ही इस विवाद के सभी पहलुओं की स्पष्ट स्थिति सामने आ सकेगी।
जमीन और मकान अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों की बढ़ी परेशानी
अटका के भू-रैयतों ने कहा कि जमीन और मकान अधिग्रहण का सीधा असर उनके परिवारों पर पड़ा है। ग्रामीणों के अनुसार, जमीन केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि कई परिवारों की आजीविका और भविष्य की सुरक्षा का आधार भी होती है।
ऐसे में अधिग्रहण के बाद उचित मुआवजा समय पर मिलना प्रभावित परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है। मुआवजे में देरी होने से परिवारों को दूसरी जगह जमीन खरीदने, मकान बनाने, व्यवसाय चलाने और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने में परेशानी हो सकती है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि करीब डेढ़ दशक बीत जाने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं होना चिंता का विषय है। उनका कहना है कि इतने लंबे समय तक इंतजार करने के बाद भी यदि मुआवजा भुगतान नहीं होता है, तो प्रभावित लोगों के लिए अपनी आर्थिक स्थिति संभालना मुश्किल हो जाता है।
प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से मांग की कि मामले की समीक्षा कर लंबित भुगतान की वास्तविक स्थिति बताई जाए और पात्र भू-रैयतों को जल्द राहत देने के लिए समयबद्ध कार्रवाई की जाए।
Bagodar अंचल कार्यालय के मुख्य द्वार पर धरना-प्रदर्शन
मंगलवार को आयोजित धरना-प्रदर्शन के दौरान अटका क्षेत्र के बड़ी संख्या में ग्रामीण और भू-रैयत बगोदर अंचल कार्यालय पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने कार्यालय के मुख्य द्वार पर अपनी मांगों को लेकर विरोध जताया।
धरने में शामिल लोगों ने मुआवजा भुगतान में हो रही देरी पर नाराजगी व्यक्त करते हुए प्रशासन से जल्द हस्तक्षेप करने की मांग की। उनका कहना था कि लंबे समय से लंबित इस मामले को अब और नहीं टाला जाना चाहिए।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया में आ रही बाधाओं को दूर किया जाए। इसके साथ ही जमीन और मकानों के मूल्यांकन तथा मुआवजा निर्धारण से जुड़े सवालों का भी स्पष्ट जवाब दिया जाए।
धरना-प्रदर्शन के माध्यम से भू-रैयतों ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि वे अपने मुआवजे के मामले को लेकर गंभीर हैं और इसके समाधान के लिए लगातार आवाज उठाते रहेंगे।
शत्रुघ्न प्रसाद मंडल के नेतृत्व में उठी मुआवजे की मांग
धरना-प्रदर्शन का नेतृत्व झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय सदस्य एवं बगोदर विधानसभा क्षेत्र के झामुमो नेता शत्रुघ्न प्रसाद मंडल ने किया। उनके नेतृत्व में भू-रैयतों ने लंबित मुआवजा भुगतान और मुआवजे की दर से संबंधित समस्याओं को उठाया।
इस दौरान प्रभावित ग्रामीणों ने अपनी मांगों को प्रशासन तक पहुंचाने पर जोर दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनकी मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि अधिग्रहित जमीन और मकानों के बदले नियमानुसार उचित मुआवजा प्राप्त करने की है।
ग्रामीणों ने उम्मीद जताई कि धरना-प्रदर्शन के बाद संबंधित अधिकारी मामले को गंभीरता से लेंगे और समस्या के समाधान की दिशा में ठोस पहल करेंगे।
प्रशासन से शीघ्र समाधान और उचित मुआवजा भुगतान की मांग
धरना-प्रदर्शन के अंत में भू-रैयतों ने प्रशासन से लंबित मुआवजे का भुगतान जल्द कराने की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि प्रभावित परिवारों को राहत देने के लिए मुआवजा निर्धारण और भुगतान की प्रक्रिया में तेजी लाई जानी चाहिए।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगों में लंबित मुआवजे की स्थिति स्पष्ट करना, आवासीय और कृषि दर से जुड़े सवालों का समाधान करना तथा पात्र भू-रैयतों को उचित मुआवजा उपलब्ध कराना शामिल है।
अटका क्षेत्र के 1129 भू-रैयतों का यह मामला अब प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है। एक ओर जीटी रोड सिक्सलेन जैसी सड़क परियोजना सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर परियोजना से प्रभावित लोगों को नियमानुसार मुआवजा मिलना भी आवश्यक है।
अब देखना होगा कि संबंधित प्रशासनिक अधिकारी और विभाग भू-रैयतों की मांगों पर क्या कदम उठाते हैं और लंबे समय से लंबित बताए जा रहे मुआवजे के भुगतान को लेकर कब तक कोई ठोस समाधान निकलता है।
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