पलामू: इंसान का शरीर नश्वर है, लेकिन समाज के लिए समर्पित जीवन की Example मृत्यु के बाद भी जीवित रहती है। कुछ लोग अपने जीवनकाल में समाज के लिए संघर्ष करते हैं और जाने के बाद भी मानवता की सेवा का रास्ता चुनते हैं। हुसैनाबाद प्रखंड के दमदमी गांव निवासी करीब 70 वर्षीय समाजसेवी रामकेश्वर मेहता भी ऐसे ही प्रेरणादायक व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने जीते-जी अपना देहदान करने का संकल्प लेकर यह साबित कर दिया कि समाजसेवा की भावना केवल जीवन तक सीमित नहीं होती।

शनिवार को रामकेश्वर मेहता का निधन हो गया। उनके निधन से परिवार, ग्रामीणों और क्षेत्र के लोगों में शोक की लहर है। हालांकि, उनके निधन के बाद भी उनका सामाजिक सरोकार समाप्त नहीं होगा। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के लिए रिम्स, रांची के एनाटॉमी विभाग को सौंपा जाएगा।

जीवन रहते लिया था देहदान का संकल्प

रामकेश्वर मेहता ने अपने जीवनकाल में ही देहदान का निर्णय लिया था। उन्होंने अपना शरीर चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के लिए दान करने का शपथ पत्र दिया था। उनके इस निर्णय के पीछे समाज और मानवता के प्रति सेवा की भावना थी।

उनका मानना था कि मृत्यु के बाद शरीर को भी समाज के किसी उपयोगी कार्य में लगाया जा सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने देहदान का संकल्प लिया। उनके निधन के बाद अब उनके परिजन उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए पार्थिव शरीर रिम्स, रांची ले जाने की तैयारी में जुट गए हैं।

यह निर्णय न केवल उनके परिवार के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। सामान्य तौर पर मृत्यु के बाद शरीर का अंतिम संस्कार किया जाता है, लेकिन रामकेश्वर मेहता ने अपने शरीर को चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के लिए समर्पित करने का फैसला किया।

चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में आएगा काम

रामकेश्वर मेहता का पार्थिव शरीर रिम्स के एनाटॉमी विभाग को सौंपे जाने के बाद चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में उपयोग किया जाएगा। मेडिकल विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना और विभिन्न अंगों को समझने में ऐसे देहदान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उनका यह फैसला आने वाले समय में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। जिस शरीर ने जीवनभर समाज के लिए काम किया, वही शरीर मृत्यु के बाद भी चिकित्सा शिक्षा के माध्यम से समाज की सेवा करता रहेगा।

इस तरह रामकेश्वर मेहता की समाजसेवा उनकी अंतिम सांस के साथ समाप्त नहीं होगी, बल्कि उनका शरीर भी भविष्य की चिकित्सा शिक्षा में योगदान देगा।

दस्तावेज में दर्ज थी अंतिम इच्छा

प्राप्त जानकारी के अनुसार, रामकेश्वर मेहता ने देहदान से संबंधित आवश्यक शपथ पत्र जीवन रहते ही दिया था। दस्तावेज में उनकी व्यक्तिगत जानकारी भी दर्ज थी। इसके अनुसार उनका जन्म 5 मार्च 1956 को हुआ था और उनके पिता का नाम मुनीश्वर महतो था।

देहदान के लिए पहले से इच्छा और दस्तावेज तैयार रखने से यह स्पष्ट होता है कि रामकेश्वर मेहता ने इस फैसले को अचानक नहीं लिया था। उन्होंने सोच-समझकर अपने शरीर को समाज और चिकित्सा क्षेत्र के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया था।

निधन के बाद उनके परिजनों ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए आगे की प्रक्रिया शुरू की है।

समाजसेवा में भी बनाई अलग पहचान

रामकेश्वर मेहता केवल देहदान के संकल्प के कारण ही चर्चा में नहीं रहे, बल्कि उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक मुद्दों के लिए संघर्ष करते हुए बिताया। दमदमी गांव और आसपास के क्षेत्र में वे सामाजिक सरोकारों से जुड़े व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान रखते थे।

स्थानीय लोगों के अनुसार, वे क्षेत्र की समस्याओं को लेकर मुखर रहते थे और जनहित के मुद्दों पर लगातार आवाज उठाते थे। उनके लिए समाजसेवा केवल किसी कार्यक्रम में भाग लेने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर लंबे समय तक संघर्ष करते रहे।

उनकी सक्रियता ने क्षेत्र के लोगों को प्रभावित किया और कई सामाजिक मुद्दों को मजबूती से सामने लाने में उनकी भूमिका रही।

सोहेया पहाड़ बचाओ संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष थे

रामकेश्वर मेहता दमदमी स्थित सोहेया पहाड़ बचाओ संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष भी रहे। सोहेया पहाड़ को अवैध उत्खनन से बचाने के लिए उन्होंने लंबे समय तक आंदोलन का नेतृत्व किया।

उन्होंने पहाड़ और पर्यावरण को बचाने के लिए स्थानीय लोगों को एकजुट किया तथा अवैध उत्खनन के खिलाफ आवाज बुलंद की। उनका मानना था कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी भी है।

इसी सोच के साथ उन्होंने सोहेया पहाड़ को बचाने के लिए लगातार संघर्ष किया।

500 दिनों से अधिक चला धरना आंदोलन

सोहेया पहाड़ को कथित अवैध उत्खनन से बचाने के लिए रामकेश्वर मेहता ने 500 दिनों से अधिक समय तक धरना आंदोलन चलाया। इतने लंबे समय तक किसी सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दे को लेकर आंदोलन जारी रखना उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।

धरना आंदोलन के दौरान उन्होंने पहाड़ और पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर अपनी आवाज उठाई। लंबे संघर्ष के बावजूद उन्होंने अपने प्रयासों को जारी रखा।

उनका यह संघर्ष क्षेत्र में सामाजिक आंदोलनों के लिए एक उदाहरण माना जाता है। उन्होंने यह संदेश दिया कि यदि किसी जनहित के मुद्दे को लेकर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ संघर्ष किया जाए तो समाज का ध्यान उस ओर आकर्षित किया जा सकता है।

अवैध उत्खनन के खिलाफ हाईकोर्ट भी पहुंचे

रामकेश्वर मेहता ने केवल धरना-प्रदर्शन तक अपना संघर्ष सीमित नहीं रखा। सोहेया पहाड़ में अवैध उत्खनन के खिलाफ उन्होंने रांची हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की थी।

उनके इस कदम से पता चलता है कि वे सामाजिक मुद्दों को कानूनी स्तर पर भी उठाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उनका प्रयास था कि प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर रोक लगे तथा संबंधित विषय पर प्रशासन और सरकार का ध्यान जाए।

बताया जाता है कि इस जनहित याचिका का अंतिम निष्पादन अभी लंबित है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित रहा जीवन

रामकेश्वर मेहता का सामाजिक जीवन पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा रहा। पहाड़ों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने को लेकर उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया।

आज जब तेजी से हो रहे विकास और निर्माण कार्यों के बीच पर्यावरण संरक्षण एक बड़ी चुनौती बन चुका है, ऐसे समय में उनका संघर्ष और भी महत्वपूर्ण दिखाई देता है। उन्होंने स्थानीय स्तर पर पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को उठाकर यह संदेश देने का प्रयास किया कि प्रकृति की रक्षा करना आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा करना है।

उनकी कोशिश केवल वर्तमान समय तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने की बात करते रहे।

निधन की खबर से क्षेत्र में शोक

रामकेश्वर मेहता के निधन की खबर फैलते ही दमदमी गांव समेत पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। सामाजिक कार्यों से जुड़े उनके सहयोगियों, ग्रामीणों और परिचितों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया।

ग्रामीणों का कहना है कि रामकेश्वर मेहता ने अपने जीवन में समाज के लिए संघर्ष किया। वे सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर लगातार सक्रिय रहे। उनके निधन से क्षेत्र ने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया, जिसने अपने निजी जीवन से आगे बढ़कर समाज के हित को प्राथमिकता दी।

अंतिम इच्छा का सम्मान करेगा परिवार

रामकेश्वर मेहता के देहदान के संकल्प को उनके परिवार ने भी सम्मान दिया है। उनके निधन के बाद परिजन उनके पार्थिव शरीर को रिम्स, रांची के एनाटॉमी विभाग को सौंपने की प्रक्रिया में जुटे हैं।

किसी व्यक्ति की अंतिम इच्छा का सम्मान करना परिवार के लिए भावनात्मक रूप से कठिन समय में भी एक महत्वपूर्ण निर्णय होता है। रामकेश्वर मेहता के परिवार ने उनके जीवनभर के विचारों और संकल्प को महत्व देते हुए उनके देहदान की इच्छा को पूरा करने का निर्णय लिया है।

मृत्यु के बाद भी समाज की सेवा

रामकेश्वर मेहता की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि उन्होंने जीवनभर समाज के लिए काम किया और मृत्यु के बाद भी समाज के काम आने का रास्ता चुना।

उनका देहदान चिकित्सा विद्यार्थियों की शिक्षा और शोध में योगदान देगा। इससे भविष्य के चिकित्सकों को मानव शरीर की संरचना को समझने में सहायता मिलेगी। इस प्रकार उनका अंतिम संकल्प भी समाज की सेवा का माध्यम बनेगा।

यह विचार अपने आप में बेहद प्रेरणादायक है कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसका शरीर किसी दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने की प्रक्रिया में योगदान दे सकता है।

युवाओं के लिए भी प्रेरणा

रामकेश्वर मेहता का जीवन युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने यह दिखाया कि सामाजिक बदलाव केवल बड़ी संस्थाओं या बड़े शहरों से नहीं आता, बल्कि एक व्यक्ति भी अपने स्तर पर किसी मुद्दे को लेकर लगातार संघर्ष कर सकता है।

सोहेया पहाड़ को बचाने के लिए 500 दिनों से अधिक समय तक आंदोलन चलाना उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। वहीं देहदान का निर्णय यह संदेश देता है कि समाज के प्रति जिम्मेदारी जीवन के अंतिम पड़ाव तक निभाई जा सकती है।

उनका जीवन युवाओं को सामाजिक जिम्मेदारी, पर्यावरण संरक्षण और मानव सेवा के लिए आगे आने की प्रेरणा देता रहेगा।

देहदान को लेकर समाज में जागरूकता जरूरी

रामकेश्वर मेहता के देहदान के फैसले से देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की जरूरत भी सामने आती है। चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के लिए देहदान महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन समाज में अभी भी इसे लेकर कई तरह की भ्रांतियां और संकोच मौजूद हैं।

यदि लोग वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टिकोण से देहदान के महत्व को समझें, तो चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में इसका लाभ मिल सकता है।

रामकेश्वर मेहता ने अपने फैसले के माध्यम से समाज के सामने एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिस पर चर्चा और जागरूकता की आवश्यकता है।

एक ऐसा जीवन जो मृत्यु के बाद भी याद रहेगा

रामकेश्वर मेहता का जीवन केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज, पर्यावरण और जनहित के मुद्दों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने सोहेया पहाड़ की रक्षा के लिए लंबा आंदोलन चलाया और न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया।

अब उनका देहदान उनके जीवन के सामाजिक सरोकारों को एक नई दिशा देगा। उनका शरीर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में उपयोग होगा और इस माध्यम से वे आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा में अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देंगे।

हुसैनाबाद प्रखंड के दमदमी गांव निवासी समाजसेवी रामकेश्वर मेहता का जीवन और उनका अंतिम संकल्प समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है। करीब 70 वर्ष की उम्र में उनके निधन से क्षेत्र ने एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता को खो दिया, लेकिन उनका योगदान उनकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होगा।

सोहेया पहाड़ को कथित अवैध उत्खनन से बचाने के लिए 500 दिनों से अधिक समय तक आंदोलन चलाने वाले रामकेश्वर मेहता ने अपने जीवन में समाज और पर्यावरण के लिए संघर्ष किया। रांची हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर उन्होंने इस मुद्दे को कानूनी स्तर पर भी उठाया।

जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनका देहदान का निर्णय उनकी सोच और मानवता के प्रति समर्पण को और भी विशेष बनाता है। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार पार्थिव शरीर रिम्स, रांची के एनाटॉमी विभाग को सौंपा जाएगा, जहां वह चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में उपयोगी साबित हो सकता है।

रामकेश्वर मेहता ने अपने जीवन और मृत्यु—दोनों को समाज के नाम कर दिया। उनका यह संदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए लंबे समय तक प्रेरणा बना रहेगा कि सच्ची समाजसेवा केवल जीते जी लोगों के काम आने का नाम नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद भी मानवता के लिए कुछ छोड़ जाने का नाम है।