जमशेदपुर: आगामी 6 सितंबर को आयोजित होने वाले ‘शिक्षकों का सम्मान, शिक्षा का उत्थान’ विषयक Seminar की तैयारियों को लेकर जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने गुरुवार को दो महत्वपूर्ण बैठकें कीं। पहली बैठक पीपुल्स एकेडमी, बाराद्वारी में प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों के साथ हुई, जबकि दूसरी बैठक उनके बिष्टुपुर स्थित आवासीय कार्यालय में महाविद्यालयों के प्राचार्यों के साथ आयोजित की गई।
बैठकों में झारखंड की शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान स्थिति, शिक्षकों की कमी, आधारभूत संरचना, सरकारी शिक्षकों से कराए जा रहे गैर-शैक्षणिक कार्यों, नई शिक्षा नीति 2020 के क्रियान्वयन और कॉलेजों की विभिन्न समस्याओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
सरयू राय ने स्पष्ट किया कि 6 सितंबर को होने वाले सेमिनार का उद्देश्य सरकार या शिक्षा विभाग की आलोचना करना नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की कमियों को सकारात्मक भाव से सामने लाकर उनके समाधान का रास्ता तलाशना है।

शिक्षा व्यवस्था की कमियों के समाधान पर होगा मंथन
पीपुल्स एकेडमी में प्रधानाध्यापकों को संबोधित करते हुए सरयू राय ने कहा कि झारखंड की शिक्षा व्यवस्था में कई तरह की कमियां हैं। इनमें केवल शिक्षकों की कमी ही नहीं, बल्कि स्कूलों में आधारभूत संरचना से जुड़ी समस्याएं भी शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि सेमिनार में इन समस्याओं को सामने रखते हुए यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि आखिर कमियां क्यों बनी हुई हैं और उन्हें दूर करने के लिए किस तरह की पहल की आवश्यकता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि चर्चा का उद्देश्य किसी व्यक्ति, विभाग या सरकार को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से समाधान तलाशना होना चाहिए।
शिक्षकों से अन्य सरकारी कार्य करवाना दस्तूर न बन जाए
बैठक में सरकारी शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक और अन्य सरकारी कार्य करवाए जाने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा।
सरयू राय ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर कभी-कभार शिक्षकों से अन्य सरकारी काम लिया जाना समझ में आता है, लेकिन इसे नियमित व्यवस्था या दस्तूर बना देना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक का मूल कार्य विद्यार्थियों को पढ़ाना और उनका शैक्षणिक विकास करना है। यदि शिक्षक लगातार दूसरे सरकारी कार्यों में लगाए जाते रहेंगे तो इसका सीधा असर विद्यालयों में पढ़ाई पर पड़ सकता है।
शिक्षा विभाग को मिलने वाले धन का फलाफल क्या है?
सरयू राय ने शिक्षा बजट और सरकारी खर्च के परिणामों को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षा विभाग को जो धन उपलब्ध कराती है, उसका वास्तविक लाभ विद्यार्थियों और शिक्षा व्यवस्था को कितना मिल रहा है, इस पर विचार करना आवश्यक है।
उन्होंने सवाल उठाया कि शिक्षा के लिए उपलब्ध कराए जा रहे पैसे का उपयोग कहां और किस प्रकार हो रहा है। क्या उस खर्च से स्कूलों और कॉलेजों की स्थिति बेहतर हो रही है या फिर परिस्थितियां पहले जैसी ही बनी हुई हैं?
सेमिनार में इस विषय पर भी सकारात्मक चर्चा किए जाने की बात कही गई है।
नई शिक्षा नीति 2020 का लाभ कॉलेजों को मिल रहा है या नहीं?
बिष्टुपुर स्थित आवासीय कार्यालय में महाविद्यालयों के प्राचार्यों के साथ हुई बैठक में नई शिक्षा नीति 2020 के क्रियान्वयन को लेकर भी विस्तार से चर्चा हुई।
सरयू राय ने कहा कि देशभर में नई शिक्षा नीति लागू की गई है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि झारखंड के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को इसका वास्तविक लाभ कितना मिल रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नई शिक्षा नीति वास्तव में संस्थानों की पुरानी समस्याओं को दूर कर पा रही है या नहीं? क्या इसके प्रावधान जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू हो रहे हैं या केवल कागजों और चर्चाओं तक सीमित हैं?
नीतियां जमीन पर उतर रही हैं या हवा में हो रही हैं बातें?
सरयू राय ने कहा कि किसी भी नीति की सफलता इस बात से तय होती है कि उसका प्रभाव जमीन पर दिखाई दे रहा है या नहीं।
उन्होंने कहा कि सेमिनार में यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि शिक्षा से जुड़ी नीतियां वास्तविक रूप से स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंच रही हैं या नहीं। यदि नीतियों को लागू करने में कोई समस्या है तो उसका कारण क्या है और उसे कैसे दूर किया जा सकता है, इस पर भी चर्चा जरूरी है।
शिक्षकों की कमी से प्रभावित हो रही पढ़ाई
बैठक में स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों की कमी का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया। कई शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों ने बताया कि पर्याप्त संख्या में शिक्षक नहीं होने के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है।
शिक्षकों पर अतिरिक्त सरकारी जिम्मेदारियां होने के कारण भी नियमित पठन-पाठन प्रभावित होने की बात सामने आई।
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।
पीएमश्री विद्यालय में विज्ञान की पढ़ाई बाधित
शाहिद इकबाल ने रखी विद्यालय की समस्या
पीपुल्स एकेडमी में आयोजित बैठक में पीएमश्री विद्यालय, बावनगोड़ा, जाकिरनगर, मानगो के प्रधानाध्यापक शाहिद इकबाल ने अपने विद्यालय की समस्याओं को सामने रखा।
उन्होंने बताया कि उनके विद्यालय में विज्ञान की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, क्योंकि शिक्षकों की संख्या बेहद कम है। उन्होंने कहा कि शिक्षक नियमित पढ़ाई कराने के बजाय विभिन्न सरकारी कार्यों में लगाए जा रहे हैं।
उनके अनुसार, कभी शिक्षकों को एसआईआर से जुड़े कार्यों में लगाया जाता है तो कभी किसी अन्य सरकारी जिम्मेदारी में। इसका सीधा असर विद्यालय के पठन-पाठन पर पड़ता है।
शाहिद इकबाल ने कहा कि पीएमश्री विद्यालयों में शिक्षकों की कमी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने विद्यालय में अविलंब शिक्षकों की संख्या बढ़ाने की मांग रखी, ताकि विद्यार्थियों की पढ़ाई सुचारू रूप से चल सके।
विद्यालय मुखिया और विधायक के नाम पर खुलें प्रधानाध्यापक
बैठक के दौरान एक प्रधानाध्यापक ने शिक्षा व्यवस्था और विद्यालयों की निगरानी को लेकर अलग तरह का सुझाव दिया।
उन्होंने कहा कि आजकल प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम पर विद्यालय खोले जा रहे हैं। उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि अब विद्यालयों के नाम स्थानीय मुखिया और विधायक के नाम पर भी रखे जाने चाहिए।
उन्होंने तर्क दिया कि यदि किसी स्थानीय जनप्रतिनिधि के नाम पर विद्यालय होगा तो संबंधित जनप्रतिनिधि कम से कम विद्यालय की स्थिति देखने के लिए वहां आ सकते हैं।
उनकी इस टिप्पणी पर बैठक में विद्यालयों की स्थानीय स्तर पर निगरानी और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर चर्चा हुई।
कॉलेजों की समस्याओं पर भी हुई विस्तृत चर्चा
बिष्टुपुर स्थित आवासीय कार्यालय में महाविद्यालयों के प्राचार्यों के साथ हुई बैठक में उच्च शिक्षा से जुड़ी कई गंभीर समस्याएं सामने आईं।
बैठक में बताया गया कि झारखंड के लगभग 80 प्रतिशत कॉलेजों के पास अपना फंड नहीं है। इससे कॉलेजों को छोटी-बड़ी आवश्यकताओं को पूरा करने में भी परेशानी होती है।
कॉलेजों में शिक्षकों और कर्मचारियों की कमी का मुद्दा भी उठाया गया। इसके अलावा प्रोफेसरों द्वारा शिक्षण कार्य के अलावा अन्य कार्यों में लगाए जाने पर भी चर्चा हुई।
कॉलेजों के पास विद्यार्थियों के परिचय पत्र तक के लिए पर्याप्त राशि नहीं
बैठक में यह बात भी सामने आई कि कुछ सरकारी कॉलेजों के पास विद्यार्थियों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। यहां तक कि विद्यार्थियों के परिचय पत्र जैसे बुनियादी कार्यों को लेकर भी आर्थिक परेशानी सामने आती है।
प्राचार्यों ने बताया कि वित्तीय संसाधनों की कमी का असर कॉलेजों की दैनिक कार्यप्रणाली और विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं पर पड़ता है।
इंटरमीडिएट की पढ़ाई बंद होने से भी परेशानी
बैठक में कॉलेजों में इंटरमीडिएट की पढ़ाई नहीं होने से उत्पन्न समस्याओं पर भी चर्चा की गई। प्राचार्यों ने बताया कि इंटरमीडिएट व्यवस्था में बदलाव का प्रभाव विद्यार्थियों और कॉलेजों की व्यवस्था पर पड़ा है।
इसके साथ ही नई शिक्षा नीति 2020 के विभिन्न प्रावधानों को लागू करने के दौरान उत्पन्न व्यावहारिक कठिनाइयों पर भी चर्चा हुई।
एक सिस्टम समझते-समझते दूसरा सिस्टम लागू होने की समस्या
बैठक में शिक्षाविदों ने यह भी बताया कि नई शिक्षा व्यवस्था के किसी एक सिस्टम को समझने और लागू करने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही दूसरा सिस्टम सामने आ जाता है।
इससे शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के सामने भ्रम की स्थिति पैदा होती है। लगातार बदलती प्रक्रियाओं के कारण शैक्षणिक संस्थानों को व्यवस्थाओं के अनुरूप खुद को तैयार करने में कठिनाई होती है।
सिलेबस और स्टडी मैटेरियल की समस्या
कॉलेजों में स्टडी मैटेरियल की कमी और पूरे झारखंड में एक समान सिलेबस नहीं होने का मुद्दा भी बैठक में उठाया गया।
प्राचार्यों ने बताया कि पाठ्यक्रम में अंतर होने से विद्यार्थियों और शिक्षकों के सामने कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा विषयों के री-अलाइनमेंट के कारण भी कई विसंगतियां सामने आती हैं।
स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित होने से परेशानी
बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम मुख्य रूप से विश्वविद्यालयों में संचालित होने के कारण कई कॉलेजों को इससे संबंधित कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
उच्च शिक्षा के विस्तार और विद्यार्थियों की सुविधा के लिए स्नातकोत्तर स्तर पर पाठ्यक्रमों के संचालन और उपलब्ध संसाधनों को लेकर भी विचार-विमर्श किया गया।
चांसलर पोर्टल और एडमिशन प्रक्रिया पर भी चर्चा
बैठक में चांसलर पोर्टल के बंद होने से विद्यार्थियों और कॉलेजों को होने वाली परेशानियों का मुद्दा भी उठाया गया।
इसके अलावा अलग-अलग तिथियों में एडमिशन पोर्टल खुलने से होने वाली समस्याओं पर भी प्राचार्यों ने अपनी बात रखी। बताया गया कि प्रवेश प्रक्रिया में असमान समय-सारिणी के कारण विद्यार्थियों और संस्थानों को कई स्तर पर परेशानी का सामना करना पड़ता है।
सेमिनार में शिक्षकों को किया जाएगा सम्मानित
सरयू राय ने बताया कि 6 सितंबर को आयोजित होने वाले सेमिनार में शिक्षकों को सम्मानित भी किया जाएगा। इसके लिए प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान से एक सबसे योग्य शिक्षक का नाम भेजने का आग्रह किया गया है।
संस्था प्रमुख द्वारा भेजे गए नाम के आधार पर चयनित शिक्षक को सेमिनार में सम्मानित किया जाएगा। सरयू राय के अनुसार, शिक्षक के साथ-साथ इससे संबंधित शैक्षणिक संस्थान का भी सम्मान होगा।
उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वाले शिक्षकों को प्रोत्साहित करना समाज और शिक्षा व्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
सकारात्मक मानसिकता के साथ आयोजित होगा सेमिनार
सरयू राय ने दोनों बैठकों में स्पष्ट किया कि 6 सितंबर का सेमिनार किसी सरकार या विभाग के खिलाफ कार्यक्रम नहीं है। इसका उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी वास्तविक समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए सकारात्मक सुझाव सामने लाना है।
उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा व्यवस्था में कमियां हैं तो उन पर चर्चा होनी चाहिए और यह भी देखा जाना चाहिए कि उन्हें दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
कार्यक्रम का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन
पीपुल्स एकेडमी में आयोजित बैठक का विषय प्रवेश नवनीत सिंह ने कराया। कार्यक्रम का संचालन विद्यालय के प्रधानाध्यापक चंद्रदीप पांडेय ने किया, जबकि सुबोध श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
बैठक में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर खुलकर विचार रखे गए। अब इन चर्चाओं और सुझावों को 6 सितंबर को आयोजित होने वाले सेमिनार में व्यापक रूप से सामने रखे जाने की तैयारी है।
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