भटकने को बाध्य किया जो
आज ऐसे असहायों को।
क्या संबोधित करूं उन्हें
ऐसे निर्लज बेहायों को।
वृद्ध-वृद्धा-विधवा-दिव्यांग
पीड़ित सब हकमारी से।
वंचित होकर पेंशन राशि
आज मर रहे भुखमरी से।
सोये हैं जन प्रतिनिधि गण
सोई हुई यह सरकार है।
कौन सुने इन गरीबों की
चारों ओर चिक पुकार है।

देखते नहीं पुत्र परिवार
असहाय ये विवश है।
पेंशन आश्रित जीवन इनके
पेंशन ही एक साहस है।
बंद है जब पेंशन अब तो
जीना इनके दुशवार है।
उपजी इन परिस्थितियों का
कौन इनके जिम्मेवार है।
पंचायत प्रखंड जिला तक
कर तो रहें ये शिकायतें।
कौन है जो सुने इनकी
कठीन करुण फरियादें।
ए निर्लज अब तो सुनो
दो इनके कष्ट पर ध्यान।
इनको रुलाकर कभी तेरा
कुछ भी नहीं होगी कल्याण।
ना मिले गर हक इनको
आने वाली दशहरा तक।
याद रखना लड़ेंगे लड़ाई
सिखाने फिर तुझे सबक।




















