सरायकेला: जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत समरसाई में आदिवासी ‘हो’ भाषा की वारंग क्षिति लिपि ओत् गुरु कोल लको Bodra की जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया गया। इस अवसर पर उनकी प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उनके योगदान को याद किया गया। कार्यक्रम के दौरान आदिवासी भाषा, संस्कृति, परंपरा और पहचान के संरक्षण को लेकर भी चर्चा हुई।

इस अवसर पर वक्ता ने कहा कि ओत् गुरु कोल लको बोदरा ने ‘हो’ भाषा और समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अपनी भाषा को लिखित रूप देने और साहित्यिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी जयंती केवल एक महान साहित्यकार को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के संकल्प का भी अवसर है।

ओत् गुरु कोल लको Bodra के योगदान को किया याद

समरसाई में आयोजित कार्यक्रम के दौरान ओत् गुरु कोल लको बोदरा के जीवन और उनके साहित्यिक योगदान को याद किया गया। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, परंपरा और संस्कृति से जुड़ी होती है। भाषा के माध्यम से ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक समाज का इतिहास, लोकज्ञान, परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत पहुंचती है।

हो समाज के लिए वारंग क्षिति लिपि का निर्माण भाषाई दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे हो भाषा को लिखित रूप में संरक्षित करने और साहित्य के विकास की दिशा में आधार मिला। वक्ताओं ने कहा कि आज जरूरत है कि नई पीढ़ी को अपनी भाषा और लिपि से जोड़ा जाए तथा इसके अध्ययन और लेखन को बढ़ावा दिया जाए।

हो भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग

कार्यक्रम में ‘हो’ भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग दोहराई गई। वक्ता ने कहा कि झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा और अन्य क्षेत्रों में भी हो भाषा बोलने वाले लोग हैं। सरकारी रिकॉर्ड में भी ‘हो’ को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग का उल्लेख पहले से मिलता रहा है।

वक्ता ने कहा कि यदि हो भाषा को संवैधानिक स्तर पर आठवीं अनुसूची में स्थान मिलता है तो भाषा के साहित्य, शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक गतिविधियों को संस्थागत स्तर पर बढ़ावा देने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

हालांकि, वर्तमान में हो भाषा आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में शामिल नहीं है। केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में राज्यसभा में बताया था कि विभिन्न भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांगें आती रही हैं, लेकिन इसके लिए कोई निश्चित मानदंड निर्धारित नहीं हैं।

भाषा और संस्कृति को बचाने पर जोर

कार्यक्रम में कहा गया कि आदिवासी समाज के लिए अपनी भाषा और संस्कृति का संरक्षण केवल साहित्यिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान से जुड़ा मुद्दा है। वक्ता ने कहा कि अपनी भाषाओं, परंपराओं और संस्कृति के प्रति सजग रहकर ही आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट पहचान को मजबूत बनाए रख सकता है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में शिक्षा, रोजगार और तकनीकी बदलाव के साथ नई पीढ़ी तेजी से दूसरी भाषाओं की ओर बढ़ रही है। ऐसे में स्थानीय और आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए घर, समाज और शैक्षणिक संस्थानों में इन भाषाओं के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना जरूरी है।

भाषा का संरक्षण केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। दैनिक बातचीत, लोकगीत, लोककथाओं, सामाजिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी मातृभाषा का इस्तेमाल बढ़ाने की जरूरत है।

प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा पर जोर

वक्ता ने अपने कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि हो, संताली, मुंडारी समेत सभी आदिवासी एवं स्थानीय भाषाओं में प्राथमिक स्तर से शिक्षा को लेकर कैबिनेट से स्वीकृति मिली थी। उनके अनुसार इसके बाद शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया भी शुरू की गई थी।

उन्होंने कहा कि बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा उनकी परिचित भाषा में मिलने से उन्हें विषयों को समझने में मदद मिल सकती है। मातृभाषा में शुरुआती शिक्षा बच्चों को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़े रखने में भूमिका निभा सकती है।

झारखंड में हो भाषा को लेकर सरकारी स्तर पर भी संस्थागत उपयोग के उदाहरण मौजूद हैं। झारखंड सरकार के राजस्व बोर्ड की वर्तमान वेबसाइट पर राज्य की जनजातीय भाषा परीक्षाओं में हो भाषा के लिए अलग पाठ्यक्रम उपलब्ध है।

आदिवासी भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने की जरूरत

कार्यक्रम में कहा गया कि आदिवासी भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ना भाषा संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। प्राथमिक स्तर पर बच्चों को अपनी मातृभाषा में पढ़ने का अवसर मिलने से भाषा के प्रति उनका जुड़ाव मजबूत हो सकता है।

इसके लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता, गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री और स्थानीय भाषाओं में किताबों का प्रकाशन जरूरी है। साथ ही, डिजिटल माध्यमों पर भी आदिवासी भाषाओं में सामग्री तैयार करने की आवश्यकता है, ताकि नई पीढ़ी तकनीक के माध्यम से भी अपनी भाषा से जुड़ी रह सके।

साहित्य और संस्कृति के विकास पर जोर

वक्ता ने कहा कि भाषा का विकास उसके साहित्य के विकास से भी जुड़ा होता है। हो भाषा में अधिक से अधिक कहानियां, कविताएं, लोककथाएं, नाटक और अन्य साहित्यिक सामग्री तैयार की जानी चाहिए।

ओत् गुरु कोल लको बोदरा जैसे साहित्यकारों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी जरूरी है। उनके जीवन और कार्यों पर आधारित अध्ययन सामग्री तैयार कर स्कूलों और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को आदिवासी भाषा-साहित्य के इतिहास की जानकारी दी जा सकती है।

उन्होंने कहा कि साहित्य किसी भी भाषा को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए हो भाषा के लेखकों और साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ उनकी रचनाओं के संरक्षण और प्रकाशन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

नई पीढ़ी को अपनी भाषा से जोड़ने की अपील

कार्यक्रम में युवाओं और विद्यार्थियों से अपनी मातृभाषा सीखने और उसके इस्तेमाल को बढ़ाने की अपील की गई। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी भाषा का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि नई पीढ़ी उसे कितनी गंभीरता से अपनाती है।

उन्होंने कहा कि युवा सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपनी भाषा में भी सामग्री तैयार कर सकते हैं। इससे भाषा को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाने में मदद मिल सकती है।

हो भाषा को लेकर शोध, शब्दकोश निर्माण, डिजिटल संग्रह और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरूरत भी कार्यक्रम में रेखांकित की गई।

संवैधानिक मान्यता को लेकर लंबे समय से मांग

हो भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग नई नहीं है। केंद्र सरकार के पूर्व आधिकारिक रिकॉर्ड में भी ‘हो’ उन भाषाओं की सूची में शामिल रही है, जिनके लिए आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की गई थी।

झारखंड सरकार की ओर से भी अतीत में हो, मुंडारी और उरांव/कुड़ुख जैसी जनजातीय भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को पत्र भेजे जाने का रिकॉर्ड उपलब्ध है।

ऐसे में ओत् गुरु कोल लको बोदरा की जयंती पर एक बार फिर हो भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग सामने आई है।

भाषा के साथ परंपराओं के संरक्षण की भी जरूरत

कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि भाषा का संरक्षण संस्कृति के संरक्षण से अलग नहीं है। आदिवासी समाज की परंपराएं, लोकगीत, लोकनृत्य, रीति-रिवाज और सामुदायिक जीवन की परंपराएं भाषा के साथ गहराई से जुड़ी हैं।

यदि भाषा कमजोर होती है तो उससे जुड़ी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के सामने भी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। इसलिए भाषा के संरक्षण के साथ पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित रखने की आवश्यकता है।

ओत् गुरु कोल लको Bodra की जयंती बनी संकल्प का अवसर

राजनगर के समरसाई में ओत् गुरु कोल लको Bodra की जयंती पर उनकी प्रतिमा को नमन कर उनके योगदान को याद किया गया। इस अवसर पर हो भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने, आदिवासी भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने तथा भाषा-साहित्य और संस्कृति के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया गया।

कार्यक्रम में यह संदेश दिया गया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए हो भाषा समेत आदिवासी एवं स्थानीय भाषाओं को नई पीढ़ी से जोड़ना और उनके साहित्यिक विकास को बढ़ावा देना आने वाले समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।