नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस यानी TMC के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहा संगठनात्मक विवाद अब चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश तक पहुंच गया है। चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पार्टी के आरक्षित ‘घास पर दो फूल’ वाले चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर फिलहाल रोक लगा दी। आयोग के अनुसार, उपचुनावों में दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट इस नाम और पुराने चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।

यह अंतरिम व्यवस्था पश्चिम बंगाल के आगामी उपचुनावों को ध्यान में रखते हुए की गई है। आयोग ने दोनों गुटों से नए अस्थायी नाम और फ्री सिंबल सूची से चुनाव चिह्न के विकल्प मांगे थे। बाद में 18 सितंबर को दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए जाने की जानकारी सामने आई।

चुनाव आयोग ने क्यों फ्रीज किया TMC का नाम और सिंबल?

चुनाव आयोग के सामने टीएमसी के संगठन और नेतृत्व को लेकर दो अलग-अलग दावे पहुंचे थे। एक पक्ष ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी पर अपना दावा कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में संगठनात्मक अधिकार का दावा कर रहा है।

आयोग ने अंतिम फैसला आने तक किसी एक गुट को मूल पार्टी का नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न देने के बजाय दोनों को अलग पहचान के साथ चुनाव लड़ाने की अंतरिम व्यवस्था की। आयोग ने कहा कि इसका उद्देश्य दोनों पक्षों को समान स्थिति देना और उनके अधिकारों की रक्षा करना है।

दोनों गुटों से मांगे गए थे तीन-तीन विकल्प

17 सितंबर के अंतरिम आदेश में आयोग ने दोनों पक्षों से तीन-तीन नाम और तीन-तीन चुनाव चिह्न के विकल्प मांगे थे। उन्हें फ्री सिंबल की सूची में से अपनी पसंद के चिह्न बताने थे। दोनों पक्ष अपने प्रस्तावित नाम में मूल पार्टी से संबंध का संकेत रखना चाहते तो ऐसा कर सकते थे।

आयोग का यह आदेश फिलहाल आगामी उपचुनावों की जरूरतों के संदर्भ में था। पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण और मूल नाम-सिंबल पर अंतिम फैसला अलग प्रक्रिया के तहत किया जाना है।

18 सितंबर को दोनों गुटों को मिली अलग पहचान

18 सितंबर को सामने आए ताजा घटनाक्रम के अनुसार चुनाव आयोग ने दोनों गुटों के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए हैं।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया है। वहीं ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है।

ये पहचान मौजूदा उपचुनावों के संदर्भ में अंतरिम व्यवस्था के तहत दी गई है। मूल पार्टी के नाम और पुराने आरक्षित चुनाव चिह्न को लेकर अंतिम विवाद अभी अलग विषय है।

विवाद की जड़ में क्या है?

दोनों पक्षों के बीच मुख्य विवाद पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति के कार्यकाल और संगठनात्मक चुनाव से जुड़ा बताया गया है।

ऋतब्रत बनर्जी गुट का दावा है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल फरवरी 2025 में समाप्त हो गया था। इस आधार पर वह उसके बाद लिए गए संगठनात्मक फैसलों और नियुक्तियों की वैधता पर सवाल उठाता है।

दूसरी ओर, ममता बनर्जी गुट इस दावे को स्वीकार नहीं करता। उसका तर्क है कि पार्टी के संविधान में बाद में किए गए संशोधनों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए और संगठनात्मक चुनाव के लिए निर्धारित अवधि अभी समाप्त नहीं हुई थी।

इस तरह विवाद केवल नेतृत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी संविधान और संगठनात्मक प्रक्रिया की व्याख्या से भी जुड़ा है।

22 जून की बैठक के बाद बढ़ा विवाद

दोनों पक्षों के बीच मतभेद उस समय और स्पष्ट हुए जब 22 जून को ऋतब्रत बनर्जी ने बागी नेताओं की बैठक बुलाई। इसके बाद नई राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन का दावा किया गया।

इसके साथ ही पार्टी के संगठन, नेतृत्व और अधिकार को लेकर दोनों पक्षों ने चुनाव आयोग के समक्ष अपने-अपने दावे और दस्तावेज पेश किए। विवाद का असर आगामी उपचुनावों में उम्मीदवारों की ओर से पार्टी के आधिकारिक नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल को लेकर भी दिखाई दिया।

उपचुनावों ने बढ़ाई चुनाव आयोग की चुनौती

आयोग के सामने सबसे तत्काल चुनौती आगामी उपचुनावों को लेकर थी। दोनों पक्षों की ओर से उम्मीदवारों के नामांकन और पार्टी के आधिकारिक प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग दावे सामने आने के कारण यह तय करना जरूरी था कि चुनाव में किस नाम और चिह्न का इस्तेमाल किया जाएगा।

इसी समय-सीमा को देखते हुए आयोग ने अंतरिम व्यवस्था अपनाई। दोनों पक्षों को अलग नाम और चिह्न देने का उद्देश्य तत्काल चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना बताया गया है।

17 सितंबर को दोनों पक्ष आयोग के सामने पहुंचे

17 सितंबर को चुनाव आयोग ने दोनों गुटों की सुनवाई की। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला प्रतिनिधिमंडल आयोग के सामने पहुंचा और अपनी ओर से संगठनात्मक दावे से संबंधित दस्तावेज और तर्क रखे।

इसके बाद ममता बनर्जी के पक्ष की ओर से भी प्रतिनिधिमंडल आयोग के सामने पेश हुआ। दोनों पक्षों ने पार्टी के संगठन और नाम-सिंबल पर अपना पक्ष रखा।

आयोग ने दोनों पक्षों के दावों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद तत्काल अंतरिम व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया।

मूल नाम और सिंबल पर अंतिम फैसला अभी बाकी

चुनाव आयोग का मौजूदा निर्णय अंतिम रूप से यह तय नहीं करता कि मूल तृणमूल कांग्रेस का संगठनात्मक अधिकार किस गुट के पास रहेगा। आयोग ने उपचुनावों की समय-सीमा को देखते हुए अंतरिम व्यवस्था बनाई है।

मूल पार्टी के नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न को लेकर अंतिम निर्णय चुनाव आयोग की संबंधित प्रक्रिया के तहत होना है। ऐसे मामलों में आयोग दोनों पक्षों के संगठनात्मक दावे, दस्तावेज और अन्य प्रासंगिक सामग्री पर विचार करता है।

उपचुनावों में बदले नजर आएंगे नाम और चिह्न

इस अंतरिम व्यवस्था का सबसे प्रत्यक्ष असर आगामी उपचुनावों पर पड़ेगा। अब दोनों पक्ष पुराने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।

मतदाताओं के सामने दोनों गुट अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ होंगे। इससे चुनावी प्रक्रिया में दोनों पक्षों की पहचान अलग रखने की व्यवस्था लागू होगी।

आगे क्या होगा?

अब चुनाव आयोग के सामने मूल विवाद का अंतिम निपटारा करना बाकी है। इसके लिए दोनों पक्षों की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों और संगठनात्मक दावों की जांच की जाएगी।

फिलहाल 18 सितंबर को आवंटित नए नाम और चुनाव चिह्न के साथ दोनों गुट संबंधित उपचुनावों में हिस्सा लेंगे। मूल पार्टी के नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न को लेकर अंतिम निर्णय आने तक चुनाव आयोग की अंतरिम व्यवस्था लागू रहेगी।

इस पूरे घटनाक्रम से तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे संगठनात्मक विवाद का चुनावी प्रक्रिया पर सीधा असर दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में आयोग के अंतिम निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि मूल पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों पक्षों के दावों का क्या नतीजा निकलता है।