रांची: जमशेदपुर पश्चिम के विधायक Saryu Roy ने कहा कि हिंदुत्व की विचारधारा को सही ढंग से जाने और समझे बिना उसकी आलोचना करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक संरचना को समझने के लिए हिंदू विचारधारा को उसके व्यापक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान लागू हुए 76 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज भी संविधान में कही गई कुछ बातों और उद्धरणों की गलत व्याख्या की जा रही है। उनके अनुसार, ऐसी सोच देश की एकता, संप्रभुता और सभ्यता-संस्कृति के लिए उचित नहीं है।

सरयू राय रांची स्थित अपने आवास पर सुप्रसिद्ध लेखक विवेकानंद झा की अंग्रेजी पुस्तक ‘हिंदू फर्स्ट’ के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने पुस्तक की विषयवस्तु और लेखक के प्रयासों की चर्चा करते हुए कहा कि शुरुआत में उन्हें लगा था कि यह पुस्तक केवल हिंदुत्व की विचारधारा तक सीमित होगी, लेकिन पुस्तक के 20 अध्यायों का अवलोकन करने पर इसमें कई समकालीन और महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किए जाने की बात सामने आती है।

‘हिंदू फर्स्ट’ में कई समकालीन विषयों पर चर्चा

Saryu Roy ने कहा कि लेखक ने ‘हिंदू फर्स्ट’ में हिंदुत्व से जुड़े विषयों के साथ-साथ बुलडोजर जस्टिस, हिंदू राष्ट्र और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम जैसे मुद्दों को भी शामिल किया है। उनके अनुसार, पुस्तक में इन विषयों को लेकर लेखक ने अपने अध्ययन और विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

उन्होंने कहा कि पुस्तक को केवल एक वैचारिक पुस्तक के रूप में देखने के बजाय इसमें उठाए गए विभिन्न मुद्दों और उनके संदर्भ को समझना भी जरूरी है। उन्होंने लेखक के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि पुस्तक के माध्यम से सनातनी विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच संवाद और एकजुटता की कोशिश दिखाई देती है।

हिंदू विचारधारा को समझे बिना आलोचना उचित नहीं

सरयू राय ने कहा कि कुछ लोग हिंदू विचारधारा को सही ढंग से जाने बिना ही उसकी आलोचना शुरू कर देते हैं। उनके अनुसार, किसी भी विचारधारा की आलोचना करने से पहले उसके मूल सिद्धांतों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामाजिक प्रभाव को समझना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता और संस्कृति को समझने के लिए हिंदू विचारधारा को भी सही परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। उनके मुताबिक भारतीय समाज और संस्कृति के विकास में सनातन परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और इस विषय पर चर्चा करते समय उसके व्यापक स्वरूप को ध्यान में रखना चाहिए।

संविधान के उद्धरणों की गलत व्याख्या पर उठाया सवाल

सरयू राय ने संविधान को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि संविधान लागू हुए कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन कुछ लोग संविधान के प्रावधानों और उद्धरणों की ऐसी व्याख्या कर रहे हैं, जो उनके अनुसार उचित संदर्भ से अलग है।

उन्होंने ऐसी मानसिकता को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि संविधान की व्याख्या देश की एकता, संप्रभुता और सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान के मूल भाव को समझे बिना किसी विशेष उद्देश्य से उसके अंशों की व्याख्या करना समाज के लिए उचित नहीं माना जा सकता।

सनातन धर्म की सहिष्णुता पर प्रहार का आरोप

सरयू राय ने कहा कि कुछ लोग हिंदू धर्म और सनातन धर्म की सहिष्णुता पर ही प्रहार करने में लगे हैं। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा की अपनी एक लंबी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है और इसे समझने के लिए इसके दर्शन तथा सांस्कृतिक परंपराओं को जानना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सनातन धर्म पर होने वाले किसी भी प्रकार के प्रहार से इसकी मूल विचारधारा समाप्त नहीं होने वाली है। उन्होंने सनातन परंपरा की निरंतरता और उसके सांस्कृतिक प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि इस विचारधारा ने लंबे समय से भारतीय समाज के विभिन्न पक्षों को प्रभावित किया है।

आदि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद का किया उल्लेख

अपने संबोधन में सरयू राय ने आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे व्यक्तित्वों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन राष्ट्रप्रेमी व्यक्तित्वों ने हिंदुत्व और राष्ट्र की अवधारणा को अपने-अपने तरीके से मजबूती प्रदान करने का कार्य किया।

उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा में आध्यात्मिकता, संस्कृति और राष्ट्रबोध के विभिन्न आयाम रहे हैं। इन व्यक्तित्वों के योगदान को समझे बिना भारतीय विचारधारा के विकास को पूरी तरह समझना कठिन होगा।

‘हिंदू फर्स्ट’ के माध्यम से एकजुटता का प्रयास Saryu Roy

सरयू राय ने लेखक विवेकानंद झा की पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि ‘हिंदू फर्स्ट’ के माध्यम से वे सनातनी विचारधारा वाले लोगों को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए लेखक को बधाई दी।

उन्होंने कहा कि किसी भी पुस्तक का महत्व केवल उसके प्रकाशन तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके माध्यम से समाज में विचार-विमर्श की शुरुआत होना भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने उम्मीद जताई कि ‘हिंदू फर्स्ट’ के माध्यम से हिंदुत्व, भारतीय संस्कृति और समकालीन राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों को लेकर व्यापक चर्चा होगी।

पश्चिम बंगाल चुनाव को केस स्टडी के रूप में देखा : डॉ. ज्योति प्रकाश

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. ज्योति प्रकाश ने पुस्तक पर अपनी बात रखते हुए कहा कि प्रारंभिक अवलोकन से यह पुस्तक एक केस स्टडी और रिसर्च के रूप में लिखी गई प्रतीत होती है।

उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के संदर्भ में पुस्तक में प्रस्तुत केस स्टडी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में तत्कालीन सरकार के कथित नकारात्मक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है।

डॉ. ज्योति प्रकाश ने कहा कि लेखक ने पश्चिम बंगाल को एक उदाहरण के रूप में चिन्हित किया है, लेकिन इसके माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से पूरे भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य की ओर भी संकेत करने का प्रयास किया गया है।

उन्होंने कहा कि पुस्तक के प्रारंभिक अवलोकन से लेखक की सभ्यता-संस्कृति और राष्ट्रीय एकता को लेकर चिंता दिखाई देती है। उन्होंने विवेकानंद झा को पुस्तक के लिए शुभकामनाएं दीं।

पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान आया पुस्तक लिखने का विचार : विवेकानंद झा

पुस्तक के लेखक विवेकानंद झा ने ‘हिंदू फर्स्ट’ की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पुस्तक लिखने का विचार उन्हें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान आया। इसी अवधि में ‘हिंदू फर्स्ट’ का विजन उनके मन में विकसित हुआ।

उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान सामने आए विभिन्न घटनाक्रम और परिस्थितियों ने उन्हें इस विषय पर विस्तार से सोचने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने पुस्तक के माध्यम से अपने विचारों और अध्ययन को प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

युवाओं के लिए ट्रेंड सेटर बनने की उम्मीद

विवेकानंद झा ने कहा कि जिस तरह ‘हनुमान अंश’ नामक धार्मिक फिल्म आज के युवाओं में भारतीय सनातन धर्म और संस्कृति को लेकर रुचि पैदा करने की दिशा में ट्रेंड सेट कर रही है, उसी तरह उन्हें उम्मीद है कि ‘हिंदू फर्स्ट’ पुस्तक भी जेन-जी और अन्य सनातनी भारतीयों के लिए ट्रेंड सेटर साबित होगी।

उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के बीच भारतीय संस्कृति और परंपराओं को लेकर संवाद स्थापित करने की आवश्यकता है। पुस्तक के माध्यम से वे इसी दिशा में अपना योगदान देने का प्रयास कर रहे हैं।

कार्यक्रम में कई गणमान्य लोग रहे मौजूद

विमोचन कार्यक्रम का संचालन प्रमोद ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम के आयोजक एवं युगांतर भारती के अध्यक्ष अंशुल शरण ने किया।

कार्यक्रम में प्रणव सिन्हा बब्बु, समीर सिंह, धर्मेंद्र तिवारी, वीरेंद्र सिंह, प्रवीण सिंह, अमित झा, राकेश सिंह, सुरेश सिंह सहित अनेक बुद्धिजीवी एवं गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे।

विचार-विमर्श का मंच बना पुस्तक विमोचन समारोह

‘हिंदू फर्स्ट’ के विमोचन के अवसर पर पुस्तक से जुड़े विषयों के साथ हिंदुत्व, सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, संविधान की व्याख्या, राष्ट्रीय एकता और समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने अपने-अपने दृष्टिकोण से पुस्तक के विषयों और उसके संभावित प्रभाव पर विचार रखे।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने लेखक के प्रयास की सराहना की और पुस्तक के माध्यम से भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं समकालीन मुद्दों पर आगे भी चर्चा जारी रहने की उम्मीद व्यक्त की। समारोह का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।