नई दिल्ली, 15 सितंबर 2026: भारत की ऊर्जा सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाली कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) अब पारंपरिक खनन से आगे बढ़ते हुए स्मार्ट, स्वचालित और कम-कार्बन खनन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। कंपनी भूमिगत और खुले दोनों तरह की खदानों में AI, IoT, डेटा एनालिटिक्स, ड्रोन, 5G, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा रही है।

इस तकनीकी बदलाव का उद्देश्य खनन की दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ दुर्घटनाओं और जोखिम को कम करना, कोयले की रिकवरी में सुधार करना और पर्यावरणीय प्रभाव को नियंत्रित करना है।

AI और ड्रोन से खनन की निगरानी

कोयला भंडार की पहचान के लिए कोर ड्रिलिंग के साथ 2D और 3D भूकंपीय सर्वेक्षण का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे बोरहोल की आवश्यकता में करीब 50 प्रतिशत तक कमी लाने में मदद मिल रही है। मशीन लर्निंग तकनीकों के जरिए गामा-रे, घनत्व और प्रतिरोधकता जैसे लॉग डेटा का विश्लेषण कर कोयला सीमों की पहचान की जा रही है।

वहीं, रिमोट सेंसिंग, GIS, LiDAR, ड्रोन और बाथिमेट्रिक सर्वेक्षण जैसी तकनीकों का इस्तेमाल खनन से पहले, खनन के दौरान और खनन के बाद किया जा रहा है।

बड़ी मशीनों से खुले खनन में बदलाव

ओपनकास्ट खदानों में CIL 42 घन मीटर क्षमता वाले फावड़े, 240 टन क्षमता वाले डंपर, ड्रैगलाइन और सरफेस माइनर जैसी हाई-कैपेसिटी मशीनों को बढ़ावा दे रहा है।

विस्फोट-मुक्त खनन तकनीक के इस्तेमाल से धूल, शोर और कंपन में कमी के साथ कोयले की गुणवत्ता और रिकवरी में सुधार की उम्मीद है। 2024-25 में विद्युत डेटोनेटरों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर अधिक सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेटरों को अपनाने की दिशा में भी कदम उठाया गया है। मशीनों में AI आधारित ऑपरेटर थकान निगरानी, प्रॉक्सिमिटी अलर्ट, 360 डिग्री कैमरा और ऑटोमैटिक फायर डिटेक्शन एवं सप्रेशन जैसी सुरक्षा सुविधाएं शामिल की जा रही हैं।

भूमिगत खदानों में लॉन्गवॉल तकनीक पर जोर

CIL भूमिगत खदानों से उत्पादन को करीब 100 मिलियन टन तक बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए कंटीन्यूअस माइनिंग के साथ लॉन्गवॉल और हाईवॉल तकनीकों को अपनाया जा रहा है।

बेहतर गुणवत्ता वाले भूमिगत कोयले को निकालने के लिए पेस्ट फिल तकनीक में निवेश की योजना है। इसके साथ ही बेहतर वेंटिलेशन और ग्राउंड कंट्रोल के जरिए भूमिगत खदानों की सुरक्षा मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।

92 First Mile Connectivity परियोजनाओं में 46 शुरू

कोयले की ढुलाई और डिस्पैच व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए First Mile Connectivity (FMC) परियोजनाओं पर भी तेजी से काम हो रहा है। कुल 92 नियोजित FMC परियोजनाओं में 46 चालू हो चुकी हैं।

इन परियोजनाओं से करीब 432 मिलियन टन सालाना क्षमता तैयार हुई है। लगभग 27,800 करोड़ रुपये के इस कार्यक्रम का लक्ष्य वित्त वर्ष 2029-30 तक 994 मिलियन टन प्रति वर्ष की मैकेनाइज्ड लोडिंग क्षमता हासिल करना है। इसके अलावा करीब 23,465 करोड़ रुपये की सात महत्वपूर्ण रेलवे परियोजनाओं में से चार पूरी हो चुकी हैं। बाकी परियोजनाओं को वित्त वर्ष 2027-28 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

5G और डिजिटल ट्विन से बनेगी स्मार्ट माइन

CIL की भविष्य की योजना में खदानों को ज्यादा से ज्यादा कनेक्टेड, ऑटोमेटेड और डेटा-ड्रिवन बनाना शामिल है। इसके लिए 5G नेटवर्क, IoT, AI/ML, एज कंप्यूटिंग और डिजिटल ट्विन जैसी तकनीकों को अपनाया जा रहा है।

भूमिगत खदानों में संचार और निगरानी के लिए स्वायत्त रोवर विकसित किए जा रहे हैं। वहीं, SECL और NCL में रिमोट-ऑपरेटेड लाइन-ऑफ-साइट डोजर का पायलट प्रोजेक्ट चल रहा है।

190 टन से अधिक क्षमता वाले डीजल-इलेक्ट्रिक डंपरों के लिए इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ट्रॉली-असिस्ट तकनीक की भी योजना है। जीवाश्म ईंधन आधारित भारी खनन उपकरणों के सुरक्षित विद्युतीकरण के लिए CIL IIT मद्रास के साथ काम कर रहा है।

DigiCoal के 17 समाधान मेगा खदानों में होंगे लागू

CIL के डिजिटल परिवर्तन कार्यक्रम के तहत सात खदानों में 17 DigiCoal समाधान का परीक्षण किया जा चुका है। अब इन्हें सभी मेगा खदानों में लागू करने की योजना है। इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, वाहन ट्रैकिंग, RFID, वेब्रिज ऑटोमेशन और GPS आधारित फ्लीट मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं से खदान संचालन को डिजिटल बनाया जा रहा है।

एंटरप्राइज स्तर पर SAP S/4HANA, ई-ऑफिस, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा एनालिटिक्स को अपनाकर खरीद, वित्त, इन्वेंट्री और मानव संसाधन से जुड़े कार्यों को एकीकृत किया गया है।

पर्यावरण निगरानी में भी AI का इस्तेमाल

CIL खनन के पर्यावरणीय प्रभावों की निगरानी के लिए रियल-टाइम वायु और जल गुणवत्ता निगरानी, AI आधारित धूल पूर्वानुमान, GIS, उपग्रह और ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा रहा है।

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के सहयोग से Bhuvan Geospatial Dashboard विकसित किया जा रहा है। इसके जरिए कोयला आग, खदान बंद करने, वनरोपण और खदान पुनर्वास जैसी गतिविधियों की निगरानी की जाएगी।

R&D पर 2030 तक 1,900 करोड़ रुपये का निवेश

CIL ने अनुसंधान एवं विकास को भी भविष्य के खनन का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। वित्त वर्ष 2030 तक R&D परियोजनाओं और उत्कृष्टता केंद्रों के लिए करीब 1,900 करोड़ रुपये निवेश करने का प्रारूप तैयार किया गया है।

IIT हैदराबाद, IIT मद्रास और IIT-ISM धनबाद से जुड़े तीन उत्कृष्टता केंद्रों में कई उच्च और निम्न TRL परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इनमें भूमिगत कोयला गैसीकरण, खदानों में 5G, स्वदेशी पेरोव्स्काइट सौर सेल और 500 टन सेल्फ-एडवांसिंग गोफ एज सपोर्ट जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।

खनन क्षेत्र में आने वाली चुनौतियां

हालांकि स्मार्ट माइनिंग की राह आसान नहीं है। भारी पूंजी निवेश, प्रशिक्षित मानव संसाधन और अलग-अलग भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुरूप वैश्विक तकनीकों को ढालना बड़ी चुनौतियां हैं।

इसके बावजूद CIL का तकनीकी रोडमैप स्पष्ट है—ऑटोमेशन, AI, रोबोटिक्स, विद्युतीकरण और हरित तकनीक के जरिए सुरक्षित, अधिक कुशल और टिकाऊ खनन व्यवस्था तैयार करना। आने वाले वर्षों में यह बदलाव भारत के कोयला उत्पादन और खनन क्षेत्र की कार्यप्रणाली को बड़े पैमाने पर बदल सकता है।