National संगठन निर्माण, मातृशक्ति के जागरण और वात्सल्यपूर्ण व्यक्तित्व का जब भी स्मरण किया जाता है, वंदनीया उषाताई चाटी का नाम आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और समाज की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनका व्यक्तित्व त्याग, अनुशासन, स्नेह, संगठन के प्रति निष्ठा और कार्यकर्ताओं के प्रति आत्मीयता का अद्भुत उदाहरण रहा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से नारी शक्ति के बीच राष्ट्र सेविका समिति का कार्य विस्तार पाने लगा। इसी संगठन की तीसरी प्रमुख संचालिका के रूप में उषाताई चाटी ने संगठन को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन केवल संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने शिक्षा, सामाजिक जागरण और राष्ट्रहित के विभिन्न कार्यों में भी सक्रिय योगदान दिया।

गणेश चतुर्थी के दिन हुआ जन्म

वंदनीया उषाताई चाटी का जन्म 31 अगस्त 1927 को गणेश चतुर्थी के दिन महाराष्ट्र के भंडारा में फणसे परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें शिक्षा, संस्कृति और समाज के प्रति विशेष रुचि दिखाई देती थी।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा भंडारा के मनरो हाई स्कूल में हुई। विद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही उनका संपर्क श्रीमती नानी कोलते द्वारा संचालित राष्ट्र सेविका समिति की शाखा से हुआ। धीरे-धीरे उषाताई समिति के विचारों और कार्यपद्धति से गहराई से जुड़ती चली गईं।

मधुर कंठ की धनी उषाताई की आवाज भी उनकी पहचान बन गई। गीत और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से वे सेविकाओं और समाज के बीच सहजता से अपनी बात पहुंचाती थीं।

शिक्षा के प्रति विशेष अनुराग

उषाताई चाटी शिक्षा के महत्व को भली-भांति समझती थीं। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए बी.ए. और बी.टी. की डिग्रियां हासिल कीं। शिक्षा के प्रति उनके अनुराग ने आगे चलकर उनके अध्यापन कार्य को भी प्रभावित किया।

वर्ष 1948 में उनका विवाह नागपुर के स्वयंसेवक श्री गुणवंत चाटी के साथ हुआ। विवाह के बाद भी उन्होंने अध्यापन कार्य जारी रखा। उन्होंने भंडारा की जकातदार कन्याशाला और बाद में नागपुर की हिन्दू मुलींची शाला में अध्यापन किया।

भूगोल और मराठी उनके प्रिय विषय थे। वे विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित शिक्षा देने के पक्ष में नहीं थीं, बल्कि उनके भीतर आत्मविश्वास और अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने की क्षमता विकसित करना चाहती थीं।

‘वाग्मिता विकास समिति’ का गठन

छात्राओं में वक्तृत्व क्षमता और आत्मविश्वास विकसित करने के उद्देश्य से उषाताई ने ‘वाग्मिता विकास समिति’ का गठन किया। लगभग तीन दशकों तक वे इसकी अध्यक्ष रहीं।

उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं है। विद्यार्थियों में विचार व्यक्त करने, समाज को समझने और जिम्मेदारी निभाने की क्षमता का विकास भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अध्यापन के दौरान उन्होंने अनेक छात्राओं को मंच पर बोलने और अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया।

कठिन परिस्थितियों में भी परिवार को संभाला

उषाताई के जीवन में एक महत्वपूर्ण और कठिन दौर वर्ष 1948 में आया। उस समय संघ पर प्रतिबंध लगा था और उनके पति गुणवंत चाटी सत्याग्रह करते हुए जेल चले गए थे।

विवाह के कुछ ही समय बाद घर की सबसे बड़ी बहू के रूप में आईं उषाताई ने उस कठिन परिस्थिति में अद्भुत धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों को संभाला और परिस्थितियों के सामने मजबूती से खड़ी रहीं।

परिवार और अध्यापन की जिम्मेदारियों के साथ-साथ सामाजिक और संगठनात्मक कार्यों के प्रति उनका समर्पण भी लगातार बढ़ता गया।

National सेविका समिति में बढ़ी जिम्मेदारियां

समिति में सक्रिय भागीदारी के चलते उषाताई को पहले नागपुर नगर कार्यवाह और बाद में विदर्भ प्रांत कार्यवाह का दायित्व मिला। इसके साथ ही उनका व्यापक प्रवास शुरू हुआ।

वे लगातार विभिन्न क्षेत्रों में जातीं, कार्यकर्ताओं और सेविकाओं से मिलतीं तथा संगठन के कार्य को आगे बढ़ाने का प्रयास करतीं। उनके आत्मीय व्यवहार के कारण कार्यकर्ताओं और सेविकाओं के बीच वे स्नेहपूर्वक ‘उषाताई’ के नाम से लोकप्रिय हो गईं।

उनका मधुर कंठ भी उनकी विशिष्ट पहचान था। वे आकाशवाणी नागपुर से कार्यक्रम प्रस्तुत करती थीं। वर्ष 1970 में उन्हें राष्ट्र सेविका समिति में अखिल भारतीय गीत प्रमुख का दायित्व सौंपा गया।

आपातकाल के दौरान भी नहीं रुका संघर्ष

वर्ष 1975 में देश में आपातकाल लागू होने के बाद उषाताई ने सत्याग्रह के माध्यम से उसका विरोध किया। इस कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

जेल में बंद महिलाओं के बीच भी उन्होंने अपने प्रेमपूर्ण और आत्मीय व्यवहार से धैर्य और साहस का संचार किया। उनके लिए संघर्ष केवल राजनीतिक विरोध का विषय नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता का हिस्सा था।

उनके व्यक्तित्व में संघर्ष और संवेदना का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता था। कठिन परिस्थितियों में भी वे लोगों को निराश होने के बजाय धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थीं।

उत्तर प्रदेश में संगठन विस्तार की जिम्मेदारी

आपातकाल के बाद वर्ष 1977 में उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में संगठन विस्तार का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने लगातार प्रवास कर विभिन्न क्षेत्रों में समिति के कार्य को मजबूत किया।

उस दौर में यात्रा और संगठन विस्तार आज की तरह आसान नहीं था। इसके बावजूद उषाताई ने सुविधाओं की चिंता किए बिना अपने दायित्व को प्राथमिकता दी। उनका उद्देश्य अधिक से अधिक क्षेत्रों में संगठन के विचार और कार्य को पहुंचाना था।

पति के निधन के बाद राष्ट्रसेवा को बनाया जीवन का केंद्र

वर्ष 1982 में पति गुणवंत चाटी के निधन के बाद उषाताई ने अपना पूरा समय राष्ट्र सेविका समिति के कार्य को समर्पित कर दिया।

वे नागपुर स्थित समिति के कार्यालय ‘अहल्या मंदिर’ में रहने लगीं। यहां वनवासी बालिकाओं का छात्रावास भी संचालित होता था। उस समय ताई आप्टे समिति की प्रमुख संचालिका थीं। उन्होंने उषाताई को सह प्रमुख संचालिका का दायित्व सौंपा।

वर्ष 1991 से उषाताई विश्व हिंदू परिषद की केंद्रीय बैठकों में भी सहभागी होने लगीं। वर्ष 1994 में ताई आप्टे के निधन के बाद उषाताई राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका बनीं।

संगठन को देशभर में किया मजबूत

प्रमुख संचालिका के रूप में उषाताई ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में संगठन के कार्य और विस्तार को गति दी। उनका जोर केवल संगठन के विस्तार पर नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ व्यक्तिगत संपर्क और आत्मीय संबंध बनाने पर भी रहता था।

वे कार्यकर्ताओं की क्षमताओं पर भरोसा करती थीं और उन्हें जिम्मेदारियां सौंपने में विश्वास रखती थीं। उनका मानना था कि जब किसी कार्यकर्ता पर विश्वास किया जाता है तो उसके भीतर आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना भी मजबूत होती है।

खापरी में हुआ भव्य कार्यक्रम

वर्ष 2005 में नागपुर के निकट खापरी में उनके नेतृत्व में लगभग दस हजार सेविकाओं का भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। यह आयोजन उनके संगठनात्मक नेतृत्व और व्यापक संपर्क का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया।

उषाताई के लिए प्रवास कभी सुविधा का विषय नहीं रहा। समस्याग्रस्त और दुर्गम क्षेत्रों में भी उन्होंने यात्रा की। कई बार उन्हें पुलिस की गाड़ी तो कभी सेना के ट्रक से यात्रा करनी पड़ी। लेकिन कठिन परिस्थितियां उनके कार्य के रास्ते में बाधा नहीं बन सकीं।

वृद्धावस्था में भी नहीं छोड़ा प्रवास

बढ़ती उम्र में अनेक शारीरिक समस्याओं ने उन्हें घेरा। घुटनों का दर्द भी लगातार परेशान करता रहा, लेकिन इसके बावजूद उनका प्रवास और कार्य नहीं रुका।

वे युवा कार्यकर्ताओं पर पूरा विश्वास करती थीं। सहयोगियों की खुले मन से प्रशंसा करतीं और सहजता से उन्हें जिम्मेदारियां सौंप देती थीं। उनके इस विश्वास से कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास पैदा होता था।

सेविकाओं के आग्रह पर बढ़ती उम्र में भी वे मधुर स्वर में गीत सुनाने से पीछे नहीं हटती थीं। उनका स्नेहपूर्ण व्यवहार उन्हें अन्य लोगों से अलग पहचान देता था।

सम्मान की राशि भी समाजसेवा को समर्पित

उषाताई चाटी को देश की अनेक संस्थाओं ने विभिन्न सम्मानों से सम्मानित किया। लेकिन उन्होंने इन सम्मानों को कभी व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में नहीं देखा।

पुरस्कार के रूप में प्राप्त धनराशि को भी उन्होंने अपने पास नहीं रखा। वे पूरी राशि ‘संघमित्रा सेवा संस्थान’ को दे देती थीं। उनके लिए सम्मान का वास्तविक महत्व तभी था, जब उसका उपयोग समाज सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाने में किया जा सके।

यह उनके त्याग और समाज के प्रति समर्पण की भावना को दर्शाता है।

17 अगस्त 2017 को हुआ निधन

लगभग नौ दशक का जीवन राष्ट्र और समाज को समर्पित करने के बाद 17 अगस्त 2017 को नागपुर स्थित समिति के कार्यालय में ही वंदनीया उषाताई चाटी का निधन हुआ।

उनके निधन के साथ राष्ट्र सेविका समिति ने एक समर्पित कार्यकर्ता, संवेदनशील मार्गदर्शक और वात्सल्यपूर्ण व्यक्तित्व को खो दिया। हालांकि, उनके जीवन के आदर्श और कार्य की प्रेरणा आज भी अनेक लोगों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है।

त्याग, वात्सल्य और संगठन निष्ठा की प्रेरक मिसाल

उषाताई चाटी का जीवन त्याग, अनुशासन, वात्सल्य, संगठन-निष्ठा और राष्ट्रसेवा का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने अपने आचरण से यह संदेश दिया कि समाज परिवर्तन केवल बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि निरंतर संपर्क, स्नेह, विश्वास और समर्पण से संभव होता है।

उन्होंने परिवार, शिक्षा, संगठन और समाज—सभी दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का ध्येय बनाया। उनका व्यक्तित्व बताता है कि दृढ़ संकल्प और समर्पण के साथ कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सेवा का मार्ग जारी रखा जा सकता है।

आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं उषाताई

उषाताई चाटी का जीवन आज भी राष्ट्र सेविका समिति की कार्यकर्ताओं और समाज जीवन में सक्रिय महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने मातृशक्ति के भीतर आत्मविश्वास जगाने, संगठन को मजबूत करने और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने में अपना जीवन लगा दिया।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—वात्सल्य को शक्ति और सेवा को साधना बना देना। वे कार्यकर्ताओं को केवल संगठन का हिस्सा नहीं मानती थीं, बल्कि परिवार की तरह उनसे जुड़ती थीं। यही आत्मीयता उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत बनी।

वंदनीया उषाताई चाटी की स्मृति हमें यह प्रेरणा देती है कि जीवन की सार्थकता केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों में नहीं, बल्कि समाज और National के लिए किए गए निस्वार्थ कार्यों में भी निहित है।