रांची/जमशेदपुर। झारखंड हाई कोर्ट ने एक मृत भारी वाहन चालक के परिवार को बड़ी राहत देते हुए मुआवजा राशि को करीब तीन गुना से अधिक बढ़ाने का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पूर्व में निर्धारित ₹5.76 लाख के मुआवजे को बढ़ाकर ₹18.30 लाख कर दिया है। इसके साथ ही बढ़ी हुई राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज देने का भी निर्देश दिया गया है।
इस महत्वपूर्ण मामले में पीड़ित परिवार की ओर से न्यायालय की सहायता के लिए जमशेदपुर निवासी युवा अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा को Amicus Curiae नियुक्त किया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान उनके द्वारा प्रस्तुत कानूनी तर्कों और तथ्यों की उच्च न्यायालय ने विशेष रूप से सराहना की।
12 वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा था परिवार
मामला वर्ष 2012 में दायर दावा याचिका से जुड़ा है। मृतक भारी वाहन चालक जहांगीर खान के परिवार ने दुर्घटना के बाद मुआवजे के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की थी। मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT), पाकुड़ ने मृतक की मासिक आय ₹4,500 मानते हुए ₹5.76 लाख का मुआवजा निर्धारित किया था।

इसके बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा। वर्ष 2014 में दायर अपील का अंतिम निस्तारण 28 अगस्त 2026 को झारखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक की अध्यक्षता में हुआ।
भारी वाहन चालक को माना कुशल श्रमिक
फैसले में उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट करते हुए कहा कि भारी वाहन चलाना एक कुशल (Skilled) कार्य है। ऐसे चालक को केवल अर्ध-कुशल (Semi-skilled) श्रमिक की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने मृतक की आय को पुनः निर्धारित करते हुए इसे ₹10,000 प्रतिमाह माना। इसके अलावा 40 प्रतिशत Future Prospects को जोड़ते हुए परिवार के लिए कुल मुआवजा ₹18.30 लाख निर्धारित किया गया।
इस तरह ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित ₹5.76 लाख की तुलना में मुआवजे में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
छह सप्ताह में राशि जमा करने का निर्देश
उच्च न्यायालय ने National Insurance Company Ltd. को निर्देश दिया कि वह ₹18.30 लाख की बढ़ी हुई मुआवजा राशि को 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ छह सप्ताह के भीतर न्यायालय में जमा करे।
अदालत के निर्देश के अनुसार ब्याज की गणना 7 जनवरी 2012, यानी दावा याचिका दायर किए जाने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक की अवधि के लिए की जानी है। हालांकि, अपील दाखिल करने में हुए 388 दिनों के विलंब को देखते हुए उस अवधि के लगभग एक वर्ष के ब्याज से बीमा कंपनी को छूट दी गई है।
अमिकस क्यूरी के रूप में अधिवक्ता ओझा की भूमिका
Amicus Curiae लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ ‘न्यायालय का मित्र’ (Friend of the Court) होता है। किसी मामले में अदालत को निष्पक्ष कानूनी सहायता, विशेषज्ञ राय और आवश्यक तथ्यों से अवगत कराने के उद्देश्य से न्यायालय किसी अधिवक्ता या विशेषज्ञ को अमिकस क्यूरी नियुक्त कर सकता है।
इसी भूमिका के तहत अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा को इस मामले में नियुक्त किया गया था। सुनवाई के दौरान उन्होंने अपीलकर्ताओं के पक्ष को कानूनी तथ्यों और तर्कों के साथ प्रभावी ढंग से न्यायालय के समक्ष रखा।
मुख्य न्यायाधीश की ओर से उनके द्वारा प्रदान की गई सहायता की विशेष रूप से सराहना की गई। न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि अमिकस क्यूरी ने अपीलकर्ताओं का पक्ष अत्यंत निपुणता के साथ प्रस्तुत किया। साथ ही झालसा को निर्देश दिया गया कि पैनल अधिवक्ताओं की निर्धारित अनुसूची के अनुसार अधिवक्ता ओझा को उनकी फीस का भुगतान किया जाए।
‘सम्मान के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी’
अदालत की सराहना पर अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें अमिकस क्यूरी के रूप में जिम्मेदारी सौंपा जाना उनके लिए सम्मान और गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि इस सम्मान के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी और नैतिक दायित्व भी जुड़ा था।
उनके अनुसार, ग्रामीण पीड़ित परिवार पिछले करीब 12 वर्षों से अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा था। ऐसे में उनका प्रयास था कि परिवार का पक्ष पूरी निष्ठा, उपलब्ध तथ्यों और मजबूत कानूनी तर्कों के साथ न्यायालय के समक्ष रखा जाए।
दावेदारों तक सीधे पहुंचेगी मुआवजा राशि
फैसले में उच्च न्यायालय ने केवल मुआवजा बढ़ाने का आदेश ही नहीं दिया, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की व्यवस्था की कि राशि का लाभ सीधे पीड़ित परिवार तक पहुंचे।
अदालत ने Amicus Curiae, झालसा और डालसा, साहेबगंज को निर्देश दिया कि वे दावेदार परिवार से व्यक्तिगत संपर्क कर मुआवजा प्राप्त करने की प्रक्रिया में आवश्यक सहायता उपलब्ध कराएं। यह सुनिश्चित किया जाना है कि मुआवजा राशि सीधे दावेदारों के बैंक खातों में स्थानांतरित हो, ताकि किसी प्रकार के शोषण या बिचौलियों की भूमिका की संभावना न रहे।
यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, बल्कि भारी वाहन चालकों के कार्य की प्रकृति और उनके पारिश्रमिक के आकलन को लेकर भी महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।




















