जमशेदपुर: Jharkhand खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है। कोयला, लौह अयस्क सहित कई महत्वपूर्ण खनिज यहां की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक गतिविधियों की रीढ़ माने जाते हैं। ऐसे में खनिजों की कीमत, उन पर लगने वाले टैक्स और सेस तथा खनन से होने वाले राजस्व को लेकर समय-समय पर राजनीतिक बहस होती रही है। इसी क्रम में राज्य सरकार की खनिज नीति और सेस को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
राज्य सरकार पर आरोप लगाया गया है कि खनिजों पर लगाया जा रहा सेस पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक है, जिसके कारण झारखंड में उत्पादित खनिज अपेक्षाकृत महंगे हो रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इसका सीधा असर खनन कंपनियों, उद्योगों, रोजगार और अंततः राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
पड़ोसी राज्यों से खनिजों की कीमतों की तुलना
उठाए गए सवालों में सबसे प्रमुख मुद्दा थर्मल कोयले की कीमत को लेकर है। उदाहरण के तौर पर G11 ग्रेड थर्मल कोयले की झारखंड में कीमत ₹2,458 प्रति टन बताई गई है, जबकि पश्चिम बंगाल में यह कीमत ₹1,741 और ओडिशा में ₹1,708 प्रति टन होने का दावा किया गया है।

यदि ये आंकड़े संबंधित शुल्क और करों को शामिल करने के बाद की वास्तविक तुलनात्मक कीमतों को दर्शाते हैं, तो झारखंड के कोयले और पड़ोसी राज्यों के कोयले के बीच लगभग ₹700 से ₹750 प्रति टन का अंतर बनता है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब उद्योगों और बिजली संयंत्रों के लिए कोयला खरीदना एक व्यावसायिक निर्णय है, तो क्या वे अधिक कीमत वाले झारखंडी कोयले की जगह कम कीमत वाले पड़ोसी राज्यों के कोयले को प्राथमिकता नहीं देंगे?
सेस को बताया जा रहा है मुख्य कारण
आरोप लगाने वालों का कहना है कि कोयला खनन करने वाली कंपनियों की मूल कीमतों में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। उनके अनुसार कीमतों में अंतर मुख्य रूप से टैक्स और सेस की वजह से पैदा हो रहा है।
इस तर्क के आधार पर राज्य सरकार की नीति पर सवाल उठाया गया है कि यदि अतिरिक्त शुल्क के कारण झारखंड का कोयला महंगा होता है, तो इससे राज्य के वैध खनन कारोबार की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, खनिजों की अंतिम कीमत केवल एक ही शुल्क से तय नहीं होती। इसमें रॉयल्टी, विभिन्न वैधानिक शुल्क, परिवहन लागत, गुणवत्ता, बाजार की स्थिति और अन्य लागतें भी भूमिका निभाती हैं। इसलिए कीमतों की वास्तविक तुलना के लिए सभी घटकों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।
अवैध खनन और कारोबार को लेकर गंभीर आरोप
राज्य सरकार की सेस नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया है कि अत्यधिक शुल्क के कारण ग्राहक वैध माध्यम से खनन कंपनियों से खनिज खरीदने के बजाय अवैध कारोबार की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
इस संबंध में यह भी दावा किया गया है कि यदि खनिजों का कारोबार अवैध तरीके से होता है, तो सरकार को रॉयल्टी, DMFT, NMET और GST जैसे वैधानिक राजस्व से नुकसान हो सकता है।
हालांकि, किसी भी अवैध कारोबार को संरक्षण देने के आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और इनकी पुष्टि के लिए ठोस दस्तावेज, आधिकारिक आंकड़े अथवा जांच के निष्कर्ष आवश्यक होंगे। इसलिए इन आरोपों को राजनीतिक दावे और आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, जब तक संबंधित सक्षम एजेंसियों या आधिकारिक स्रोतों से इनकी पुष्टि न हो।
MMDR संशोधन को लेकर भी राजनीतिक बहस
खनिज क्षेत्र से जुड़े कानूनों और नीतियों को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों की बहस लंबे समय से चलती रही है। इसी संदर्भ में MMDR कानून में संशोधन का मुद्दा भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना है।
आलोचकों का आरोप है कि केंद्र सरकार द्वारा अवैध खनन और कारोबार पर नियंत्रण के लिए किए गए प्रयासों को राज्य में अलग राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया। उनका कहना है कि आम आदिवासी और मूलवासी जनता को कई बार जटिल कानूनी एवं आर्थिक मुद्दों की पूरी जानकारी नहीं मिल पाती, जिसका राजनीतिक लाभ उठाया जा सकता है।
वहीं, राज्य के अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यों की भूमिका को लेकर भी अलग-अलग राजनीतिक दलों के अपने तर्क रहे हैं।
वन नेशन वन टैक्स के संदर्भ में उठाया सवाल
राज्य सरकार की सेस नीति को लेकर ‘One Nation, One Tax’ की अवधारणा का भी उल्लेख किया गया है। तर्क दिया गया है कि जब देश में कर व्यवस्था को सरल और अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, तब खनिज क्षेत्र पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की नीति की समीक्षा होनी चाहिए।
इस मुद्दे पर यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि अन्य खनिज उत्पादक राज्यों में ऐसी व्यवस्था को लेकर समान आपत्ति नहीं है, तो झारखंड में इसे लेकर अलग स्थिति क्यों है?
हालांकि, राज्य और केंद्र के कराधिकार तथा सेस से जुड़े प्रावधान कानूनी और संवैधानिक विषय हैं। इनके वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए संबंधित कानूनों और न्यायिक फैसलों का पूरा संदर्भ देखना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया गया हवाला
खनिजों से जुड़े सेस के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया गया है। दावा किया गया है कि संसद के पास ऐसे सेस से संबंधित प्रावधानों को कम करने अथवा हटाने का अधिकार है।
इस आधार पर यह सवाल उठाया गया है कि यदि केंद्र स्तर पर इस विषय में बदलाव संभव है, तो राज्य सरकार को अपनी नीति पर पुनर्विचार क्यों नहीं करना चाहिए।
यह पूरा विषय कानूनी प्रावधानों, राज्यों के अधिकारों और केंद्र की विधायी शक्तियों से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित कानून और न्यायिक निर्णयों के आधिकारिक पाठ के आधार पर ही निकाला जाना उचित होगा।
सेस से प्राप्त राशि के इस्तेमाल पर सवाल
खनिज संपदा से राज्य सरकार को बड़ी मात्रा में राजस्व प्राप्त होता है। ऐसे में सेस से प्राप्त राशि के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
आलोचकों का कहना है कि पिछले वर्षों में यदि हजारों करोड़ रुपये सेस के रूप में एकत्र हुए हैं, तो इस राशि का उपयोग खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास में दिखाई देना चाहिए।
विशेष रूप से प्रदूषण, विस्थापन, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और आधारभूत सुविधाओं की समस्याओं से जूझ रहे गांवों के विकास पर ध्यान देने की मांग की गई है।
खनन प्रभावित गांवों के विकास की मांग
खनन क्षेत्र से जुड़े इलाकों में प्रदूषण, विस्थापन और आधारभूत सुविधाओं की कमी जैसी समस्याएं महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। ऐसे क्षेत्रों में खनिज से मिलने वाले राजस्व का एक हिस्सा स्थानीय विकास और प्रभावित समुदायों के हित में प्रभावी ढंग से खर्च किए जाने की अपेक्षा की जाती है।
इसी संदर्भ में सवाल उठाया गया है कि क्या सेस की राशि से खनन प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्मार्ट विलेज, बेहतर सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल और रोजगारपरक योजनाएं विकसित नहीं की जा सकती थीं।
यह मांग राज्य की खनिज नीति में केवल राजस्व संग्रह के बजाय स्थानीय विकास को भी प्राथमिकता देने से जुड़ी है।
नए खदानों को शुरू करने की जरूरत पर जोर
राज्य में राजस्व बढ़ाने के विकल्प के रूप में नए खदानों को शुरू करने का सुझाव भी दिया गया है। आलोचकों का कहना है कि ओडिशा की तर्ज पर नए खनन क्षेत्रों को विकसित कर सरकार रॉयल्टी और नीलामी प्रीमियम के माध्यम से अतिरिक्त राजस्व अर्जित कर सकती है।
दावा किया गया है कि केंद्र सरकार की ओर से कुछ खदानों को आवश्यक मंजूरियां दी जा चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठाया गया है कि यदि कानूनी और पर्यावरणीय प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं, तो उन खदानों को शुरू करने में देरी क्यों हो रही है।
हालांकि, किसी भी खदान को शुरू करने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी, वन अधिकार, भूमि अधिग्रहण, स्थानीय समुदायों की सहमति और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन जरूरी होता है।
स्थानीय खनन कंपनियों पर पड़ने वाले असर की चिंता
सेस और खनिज कीमतों को लेकर उठाए गए सवालों का एक महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय खनन उद्योग और रोजगार भी है।
आरोप है कि अधिक शुल्क के कारण झारखंड की खनन कंपनियों को पड़ोसी राज्यों के मुकाबले प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान हो रहा है। यदि ग्राहक महंगे खनिज की जगह दूसरे राज्यों से खरीदारी करने लगते हैं, तो स्थानीय कारोबार पर दबाव बढ़ सकता है।
इसका प्रभाव खदानों के संचालन, परिवहन, सहायक उद्योगों और प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार पर भी पड़ने की आशंका जताई गई है।
झारखंड के विकास से जुड़ा व्यापक सवाल
झारखंड आंदोलन के दौरान राज्य के प्राकृतिक संसाधनों और यहां के लोगों के अधिकारों को लेकर बड़े सपने देखे गए थे। राज्य बनने के बाद भी यह सवाल लगातार उठता रहा है कि प्राकृतिक संपदा का लाभ स्थानीय जनता तक किस तरह पहुंचे।
खनिज संपदा झारखंड की ताकत है, लेकिन इसका इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए, यह राज्य की आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण विषय है।
एक ओर खनिज से सरकार को राजस्व मिलता है, वहीं दूसरी ओर खनन से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को प्रदूषण, विस्थापन और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए खनन नीति में राजस्व, रोजगार, पर्यावरण और स्थानीय विकास के बीच संतुलन जरूरी है।
सरकार से नीति की समीक्षा की मांग
खनिजों पर सेस को लेकर उठाए गए सवालों के बीच राज्य सरकार से अपनी नीति की समीक्षा करने की मांग की गई है। इसके साथ ही खनिजों की कीमतों को पड़ोसी राज्यों के साथ प्रतिस्पर्धी बनाने, नए खदानों को नियमों के अनुसार शुरू करने और खनन प्रभावित क्षेत्रों में राजस्व का प्रभावी उपयोग करने की मांग भी सामने आई है।
यदि झारखंड अपने खनिज संसाधनों का पारदर्शी और संतुलित तरीके से उपयोग करता है, तो इससे सरकार के राजस्व के साथ-साथ उद्योग और रोजगार को भी मजबूती मिल सकती है।
सड़क से सदन तक विरोध की चेतावनी
खनिजों पर सेस की मौजूदा नीति को लेकर विरोध करने वालों ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने इस दिशा में पुनर्विचार नहीं किया, तो मुद्दे को सड़क से लेकर सदन तक उठाया जाएगा।
आलोचकों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों का सीधा प्रभाव आम लोगों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए ऐसी नीतियों पर व्यापक चर्चा और पारदर्शिता जरूरी है।
Jharkhand में कोयला और अन्य खनिजों पर सेस का मुद्दा केवल टैक्स या राजस्व तक सीमित नहीं है। इसका संबंध खनन उद्योग, स्थानीय रोजगार, सरकारी आय, अवैध कारोबार पर नियंत्रण, पर्यावरण, विस्थापन और राज्य के समग्र विकास से भी जुड़ा हुआ है।
एक ओर राज्य सरकार के लिए खनिजों से अधिक राजस्व जुटाना महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर अत्यधिक शुल्क के कारण वैध कारोबार की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित न हो, यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है।
सरकार, उद्योग, स्थानीय समुदाय और विशेषज्ञों के बीच संवाद के माध्यम से ऐसी नीति तैयार की जानी चाहिए, जिससे झारखंड की खनिज संपदा का लाभ राज्य को मिले, स्थानीय लोगों को रोजगार और विकास के अवसर मिलें तथा पर्यावरणीय हितों की भी रक्षा हो।




















